चित्त का परिघटनाशास्त्र — भूमिका पर व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ (पैराग्राफ 1-21, 54-72)
आर. श्रीवत्सन, अदिति मुखर्जी (2026)
आर श्रीवट्सन[1] और अदिति मुखर्जी[2]
1. हेगेल अपनी भूमिका की शुरुआत इस बात से करते हैं कि आमतौर पर भूमिकाओं में क्या गलत होता है। आमतौर पर लेखक यह बताता है कि उसने यह काम क्यों शुरू किया और इस काम का उसी विषय पर लिखी गई दूसरे लेखों से क्या संबंध है। लेकिन, दर्शन के असली मुद्दे को पकड़ने के लिए यह तरीका न सिर्फ गैर-ज़रूरी है बल्कि बिल्कुल गलत भी है। इतिहासें, सामान्य व्याख्याएं, या आकस्मिक दावे दर्शन की सच्चाई तक पहुँचने के रास्ते नहीं हैं।
दूसरी दिक्कत यह है कि क्योंकि दर्शन सार्वभौमिकता यानी “सम्पूर्ण” के दायरे में काम करता है, पहली नज़र में विशिष्टताएं (particulars) महत्वहीन लगती हैं। लेकिन हम जानते हैं कि किसी दूसरी विज्ञान-शाखा में, जैसे कि शरीर-रचना (anatomy) में, सिर्फ़ इतना जानना कि यह शरीर और उसके हिस्सों के बारे में है, काफ़ी नहीं है – हमें यह भी जानना पड़ेगा कि ये हिस्से एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं। अगर हम किसी विषय की केवल सतही समझ ही रखें, तो ये महज़ एक सामान्य बातचीत जैसी होगी जैसे, (हेगेल के समय में और उनके अपने अनुसार) शरीर-रचना विज्ञान बस हड्डियों और मांसपेशियों की एक तालिका और विवरण तक सीमित था। ऐसा ज्ञान किसी भी मायने में विज्ञान कहलाने के लायक़ नहीं होगा। तीसरी समस्या यह है कि खुद दर्शन ही यह दिखा देगा कि इस तरह की सोच (जो आकस्मिक, सतही, या बेतरतीब हो) काम नहीं करेगी।
2 पिछले पैराग्राफ़ की दूसरी बात-- “इसी मुद्दे पर भूतपूर्व और समकालीन कृतियों के दृष्टिकोण के साथ इस कृति का क्या संबंध है” – को आगे बढ़ाते हुए हेगेल कहते हैं कि ऐसा करने से सच को जानने की प्रक्रिया में असली बात को छिपा देती है।
असल समस्या यह है कि आमतौर पर एक विचारधारा खुद को दूसरे से इसलिए अलग करती है कि वह खुद को सही और दूसरे को गलत मानती है। साधारण सोच (common-sense) के अनुसार यह विरोध एक स्थायी चीज़ है – और किसी भी दार्शनिक व्यवस्था की तुलना दूसरे से करने का मतलब बस यह साबित करना है कि दूसरा गलत है। लेकिन साधारण सोच यह नहीं समझ पाती है कि अलग-अलग दार्शनिक प्रणालियाँ वास्तव में सत्य के विकास की प्रक्रिया है – उसे बस यह दिखाई देता है कि नया विचार पुराने से टकरा रहा है।
हेगेल अपने मशहूर “उपमा” में कहते हैं कि कोई यह तर्क दे सकता है कि कली को फूल गलत साबित कर देता है; फूल को फल; और फिर फल को पेड़। ये सभी एक-दूसरे की जगह लेते हैं और देखने में अलग और एक-दूसरे के विपरीत लगते हैं। लेकिन, अगर गहराई से देखें, तो कली से फूल, फूल से फल, और फिर फल से पेड़ तक एक बहती हुई जैविक प्रक्रिया (organic flow) है, जिसमें हर चरण उतना ही ज़रूरी है जितना दूसरा। यह पूरी प्रक्रिया पेड़ की जीवित सच्चाई है। लेकिन अब तक “दार्शनिक साधारण सोच” इसे नहीं देख पाती है – वह सत्य में अंतर्निहित आपसी संबंध और विरोध की ज़रूरत को समझ ही नहीं पाती। उसके लिए टकराव और विरोध का सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता।
हमने “उपमा” शब्द को उद्धरण-चिह्नों में रखा है क्योंकि हेगेल के लिए जीवन और जैविकता (organicity) चित्त (spirit) के लिए महज़ उपमा नहीं हैं – बल्कि, ये चित्त के सबसे शुरुआती और स्थायी रूप हैं। इसी तरह, “दार्शनिक साधारण सोच” कहना हेगेल के दर्शन को बाकी प्रचलित दर्शनों से अलग दिखाने का एक शॉर्ट्हैन्ड तरीका है। हेगेल अपने दर्शन को दूसरों से अलग रखते हैं, लेकिन उनके और पुराने विचारों के बीच भी वे कली-फूल-फल-पेड़ जैसा एक जैविक संबंध स्थापित करते हैं। उनका दर्शन इस विकास की सबसे उन्नत रूप है।
3 हेगेल, भूमिका में अपने प्रबंध को दूसरों के प्रबंध से अलग दिखाने की परंपरा पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि अक्सर यह मान लिया जाता है कि यह पूछना कि किसी का प्रबंध दूसरों से कैसे अलग है – यही सबसे ज़रूरी चीज़ है – यानी प्रबंध का सार। निश्चित रूप से, किसी प्रबंध के उद्देश्य और परिणाम दूसरों के प्रबंध से कैसे अलग हैं, यह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब इस प्रक्रिया को केवल ज्ञान की शुरुआत नहीं बल्कि वास्तविक ज्ञान ही मान लिया जाता है, तो यह असली मुद्दे से बचने की कोशिश बन जाती है – एक दिखावा, जो गंभीरता और संवाद का नाटक करता है, लेकिन वास्तव में न तो गंभीर होता है और न ही असली मुद्दे से जुड़ता है।
(टिप्पणी: यह ध्यान देने वाली बात है कि आजकल के अकादमिक शोध पत्र भी इसी तरह शुरू होते हैं – “आप क्या नया कह रहे हैं?” लेकिन इसके बाद शोध का असली काम समस्या की गहराई में जाना और प्रस्तावित विचार की व्याख्या करना होता है।)
मूल विषय (The Thing), यानी कि असली मुद्दा, प्रबंध का एकमात्र उद्देश्य नहीं है, बल्कि यह भी है कि उसका विस्तार कैसे किया गया है; यह केवल परिणाम नहीं है, बल्कि यह भी है कि वह परिणाम कैसे प्राप्त हुआ। उद्देश्य एक निर्जीव अमूर्तन है, और बिना इस उद्देश्य के आगे बढ़ने की प्रवृत्ति बस एक बहाव है; इसी तरह, परिणाम सोचने की प्रक्रिया का एक मृत अवशेष है। हेगेल का तर्क है कि उद्देश्य, प्रक्रिया और परिणाम के बीच का अटूट जैविक संबंध ही हमें ज्ञान का एक ठोस सार्वभौमिक (concrete universal) मॉडल प्रदान करता है।
इसी तरह, एक व्यक्ति के लेखन और दूसरे व्यक्ति के लेखन के बीच का अंतर ही सीमा या दहलीज का चिह्न है। सीमा के परे असली मुद्दा मौजूद नहीं रहता। तो फिर उस विषय की चर्चा करना क्यों ज़रूरी है जहाँ असली मुद्दा है ही नहीं? असली सवाल तो यह है कि मुद्दा वास्तव में क्या है और कैसे मौजूद है।
ऐसी सतही कोशिशें आसान हैं। ये तरीके हमेशा मूल मुद्दे से आगे बढ़ जाते हैं – उसके साथ टिके रहने और उसमें लीन होने के बजाय, यह तरीका हमेशा मुद्दे के परे किसी और चीज़ की तलाश करता है। इसे मुद्दे में रुचि नहीं है; यह अपने आप में और अपनी योग्यता में रुचि रखता है – यह आत्म-केंद्रित है। आखिर दूसरों को गलत ठहराना और क्या होता है?
किसी ठोस काम की आलोचना करना आसान है। उसे समझना कठिन है। अपने स्वयं के चिंतन में इसका (तर्कपूर्ण) विवरण प्रदान करना सबसे कठिन है। दूसरे शब्दों में, किसी से खुद को अलग दिखाना आसान है। उसके वक्तव्य को समझना कठिन है। और सबसे कठिन यह है कि उसके काम में जो अच्छा है उसे अपनाना, जो गलत है उसे छोड़ना, और इसे अपने विचारों में इस तरह बुनना कि पहले के काम को पूरी तरह से खारिज न किया जाए।
4. हेगेल ने जिस चिंतन पद्धति की आलोचना की है, अब उसे तीन चरणों में सटीक रूप से वर्णित करते हैं।
पहला, यह जड़ जीवन की अमध्यस्थता है, एक ऐसा जीवन जो बिना किसी विचार के जिया जाता है, जिसमें व्यक्ति बिना सोचे समझे दैनिक जीवन की अर्थपूर्णता और महत्व के प्रवाह में तैरता रहता है। यह आदत, अभ्यास, रीति रिवाज़, और प्रश्न किए बिना जीवन है।
दूसरा, इस अमध्यस्थ जीवन से ऊपर उठने की एक प्रक्रिया होती है, जिसे हेगेल “संस्कृति” कहते हैं—यानी चित्त (spirit) का उभरना। इस प्रक्रिया में, सबसे पहले हम सार्वभौमिक सिद्धांतों और दृष्टिकोणों को समझते हैं, फिर हम “मूल विषय” पर विचार करते हैं, और उसको व्यापक रूप में देखना शुरू करते हैं। इसके बाद, हम ऐंद्रिय संसार को गहराई और स्पष्टता के साथ समझना सीखते हैं, उसका विवरण प्रस्तुत करते हैं और उसको जांचते हैं। हेगेल ने इन सभी प्रक्रियाओं की आलोचना की है, यदि वे यह दिखावा करते हैं कि वे दर्शन हैं। उनके अनुसार, जब तीसरे चरण में प्रवेश किया जाता है, तो ये सभी प्रक्रियाएँ “पीछे छूट जाती हैं”।
लेकिन (और यही तीसरा चरण है), जब अवधारणा (Concept) गंभीरता से असली विषय की गहराई में उतरती है, तब उपरोक्त विचार प्रक्रियाएँ—सार्वभौमिक सिद्धांत, दृष्टिकोण, महत्वपूर्ण तत्वों का सामान्य रूप, ऐंद्रिय जगत की समृद्धि—सामान्य बातचीत में अपनी जगह बनाए रखती हैं, लेकिन वे दार्शनिक चिंतन के कार्य का स्थान नहीं ले सकतीं।
तो फिर दार्शनिक चिंतन का कार्य क्या है? यह अवधारणा की वह हरकत है, जो विषय को संबोधित करती है। भूमिका (Preface) में अवधारणा शब्द का यह पहला उपयोग है, और संभवतः पूरी पुस्तक में भी पहली बार (हालाँकि भूमिका सबसे अंत में लिखी गई थी)। हेगेल की अवधारणा क्या है? यह विचार की जैविक गति है, जो अपनी पूर्णता में विकसित होती है, और महत्वपूर्ण विषय के मूल को छूती है। यह विचार, चित्त में बीज से वृक्ष तक की यात्रा है। यह संपूर्णता ही मूल विषय है—जो बीज में आत्मा या अंतर्निहित संभावना से लेकर उसके विस्तार की प्रक्रिया, और एक विशिष्ट स्थान/विशिष्ट बाध्यताओं में पूर्ण रूप से विकसित एक निराला वृक्ष तक की यात्रा। यहाँ यह याद रखना बहुत ज़रूरी है कि जब हेगेल कहते हैं कि विचार अवधारणा के रूप में किसी वस्तु की गहराई में प्रवेश करता है, तो विचार ही व्यक्ति/कर्ता होता है, न कि विचार करने वाला व्यक्ति। विचार की व्यापक प्रवाह में व्यक्ति, भाले की नोक की तरह, एक अभिव्यक्ति मात्र है।
5. हेगेल का पहला वाक्य यहाँ महत्वपूर्ण है: “सत्य का वास्तविक रूप केवल वैज्ञानिक प्रणाली के रूप में ही हो सकता है।” संपूर्णता ही सत्य का वास्तविक रूप है जो वैज्ञानिक रूप से विकसित एक पूर्ण प्रणाली है। हेगेल इसे कुछ पैराग्राफ के बाद (पैराग्राफ 20) और गहराई से दोहराते हैं: “सत्य संपूर्णता है।”
हेगेल का कहना है कि उनका लक्ष्य दर्शन को इस पूर्ण रूप, यानी उसके अपने गंतव्य (जो हेगेल का नहीं, बल्कि स्वयं दर्शन का है) के निकट लाना है, जहाँ दर्शन “ज्ञान से प्रेम” (जिसका अर्थ ही 'philosophy' शब्द में निहित है) से आगे बढ़कर वास्तविक ज्ञान बन सके। ज्ञान स्वयं एक आंतरिक अनिवार्यता के कारण वैज्ञानिक होने की माँग से चालित है, और इसकी व्याख्या का एकमात्र उचित तरीका यह है कि दर्शन खुद को तार्किक रूप से व्यक्त करे।
लेकिन यह आंतरिक, तार्किक अनिवार्यता एक दार्शनिक के सोच में बाहरी रूप से प्रकट होती है। जब इस सोच से व्यक्तिगत इच्छाएँ और प्रवृत्तियाँ अलग की जाती हैं, तब यही दर्शन की आंतरिक, तार्किक अंतर-प्रेरणा होती है। यह आत्म-व्याख्यान की तर्क-पद्धति है, जो समय की बाह्यता में व्यक्त होती है, जिसमें दर्शन का विकास और व्याख्यान के अलग-अलग स्तर दिखायी देते हैं। (जैसे कली अपने को फूल में, फिर फल, बीज और पेड के रूप में प्रकट करती है)। इस बाहरी ज़रूरत को पूरी करते हुए, (हेगेलियन) दार्शनिक को यह दिखाना चाहिए कि दर्शन अब वास्तविक ज्ञान बनने के लिए तैयार है (सिर्फ ज्ञान के प्रेम तक सीमित नहीं)। दर्शन की इस परिपक्वता को ज़ाहिर करना ही दार्शनिक का एकमात्र मकसद है, क्योंकि सिर्फ यही दर्शन के मकसद को स्पष्ट करेगा और उसे पूरा भी करेगा।
यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि दर्शन के सत्य की ओर बढ़ने की प्रक्रिया का कालक्रमिक रूप ही उसकी आंतरिक तर्कपद्धति की अभिव्यक्ति है। चिंतक सिर्फ दर्शन की अपनी पूरी विकसित प्रणाली बनने की अंतर-प्रेरणा का साधन है। (पिछले पैराग्राफ की आखरी मन्तव्य को देखें)।
6. अगर सत्य के सच्चे रूप (जो पिछले पैराग्राफ के अनुसार, वैज्ञानिक प्रणाली के रूप में बसता है) को सिर्फ अवधारणा में ही होने का दावा किया जाए, तो हेगेल कहते हैं कि ऐसी सोच उनके युग के एक अन्य महत्वपूर्ण विश्वास के विपरीत है। सरल शब्दों में (बिना सैद्धांतिक विस्तार के, क्योंकि हम हेगेल के पाठक अभी तक इसे करने में सक्षम नहीं हैं), यह विरोधी मत कहता है कि अंतर ज्ञान (परम सत्य, धर्म, या ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित अस्तित्व का सीधा ज्ञान) ही सत्य तक पहुँचने का एकमात्र साधन है।
अगर ऐसा है, यानी सत्य की उपस्थिति अवधारणा में होने के बजाय केवल अंतःप्रज्ञा में होती है, तो (हेगेल के दार्शनिक पद्धति के विपरीत) एक दूसरे पद्धति की ज़रूरत है—परम सत्ता (या ईश्वर) को समझा नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसे सिर्फ अंतर-ज्ञान से अनुभव या महसूस किया जाना चाहिए।
संक्षेप में, अवधारणा अंतर-ज्ञान का विपरीत है; बोध अनुभव का विपरीत है। और हेगेल इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अवधारणा और बोध, अनुभव और अंतर-ज्ञान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
7. यहाँ पर, हेगेल अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उस मांग की आलोचना करते हैं जिसे वे “अदार्शनिक” (unphilosophical) मानते हैं—यानी यह मांग कि परम सत्य का अनुभव केवल अंतर ज्ञान (intuition) या अनुभव (feeling) के ज़रिए होना चाहिए। हेगेल इस मांग को चित्त (Spirit) के ऐतिहासिक विकास के परिप्रेक्ष्य में रखते हैं:
वे बताते हैं कि अब तक पश्चिमी इतिहास में चित्त उस अवस्था से आगे बढ़ चुकी है जिसमें वह एक ठोस जीवन (substantial life) में डूबी हुई रहती थी—ऐसा जीवन जिसमें व्यक्ति उस संस्कृति को बिना प्रश्न किए स्वीकार करता है, और ऐसे नियमों का पालन करता है जिनका उसे बोध भी नहीं होता। दूसरे शब्दों में, चित्त उस विश्वास आधारित जीवन से आगे बढ़ चुकी है जिसमें व्यक्ति एक अनुभूत ईश्वर (felt God) के साथ पूर्ण एकत्व में सुखी रहता है। चित्त न केवल इस प्रत्यक्ष और अनुभूत अस्तित्व से निकल चुकी है, बल्कि उस आरंभिक चिंतन से भी आगे बढ़ चुकी है, जहाँ उसने पहली बार ठोस जीवन से बाहर निकल कर उसे समझने का प्रयास किया था।
इस अवस्था में चेतना अपने मूलतत्व से सीधा संबंध खो चुकी है और इस नुकसान को स्पष्ट रूप से पहचानती है—वह दुःखी है।
इस स्थिति में दुःखी चेतना अपने सुखद अस्तित्व की खोल से मुँह मोड़ लेती है, और अपनी आस्था की विफलता को स्वीकार करते हुए स्वयं को ही दोषी मानती है। यह बेतुकी मांग करती है कि दर्शन इसे इसकी आदिम प्रसन्नता और आस्था में लौटा दे — ईश्वर-में-बसे एक अचिंतित अस्तित्व की अवस्था में।
वह दर्शन से यह नहीं मांगती कि वह ठोस अस्तित्व की अस्पष्टता को तार्किक और स्पष्ट रूप से व्यक्त करे, न ही वह चाहती है कि दर्शन चिंतन को आत्म-सचेतन रूप में लाए। दर्शन से अपेक्षा है कि वह विचार की सीमाओं को धुँधला दे, तर्क को दबा दे, और जीवन से उपजी असंतुष्टि का उपचार केवल उस अनुभव या अंतर-ज्ञान द्वारा करे जो परम तत्त्व (ईश्वर) की अनुभूति कराती है। दर्शन से अपेक्षा की जाती है कि वह मुख्य मुद्दे — अर्थात् अपनी संकटपूर्ण स्थिति— पर वैचारिक अंतर्दृष्टि प्रदान करने के बजाय केवल नैतिक शिक्षण दे। यह मांग, चिंतन को सुस्त करने वाली एक अफीम की है, न कि स्पष्टता और चोखेपन की।
पवित्र, शुद्ध, धर्म (जो अपने सबसे सादे और अचिंतित रूप में होता है) और शाश्वत जैसे अनुभवों को ऐसे चारे की तरह प्रस्तुत किया जाता है जो इस चित्त को उसके दुःख से बाहर खींच लाएंगे। ऐसा दृष्टिकोण फिर से उन्माद और मदहोशी, उत्साह और भक्ति की वापसी चाहता है—न कि चिंतन और अवधारणा (concept) की शीतल प्रगति।
ये सभी मांगें एक नैतिक सत्ता की प्रसन्नतादायक व्यवस्था की पुनःस्थापना चाहती हैं – एक अचिंतित नैतिक जीवन।
इस अनुच्छेद का संदर्भ है: ग्रीक नैतिक मूलतत्व की मृत्यु, रोमन स्टोइकवाद का जन्म, संशयवाद द्वारा आत्म के आधार का पतन, और मध्ययुगीन पश्चिमी चेतना की दु:खदायी स्थिति।
इस स्तर पर, हेगेल अवधारणा को शीतल प्रगति की ओर धकेलते हैं—जहाँ चिंतन और यथार्थ अस्तित्व का जैविक विकास अंततः उस एकीकृत रूप तक पहुँचता है, जिसे वे प्रत्यय (Idea) कहेंगे।
- दार्शनिक सोच में, किसी अवधारणा के तार्किक प्रवाह से हटकर ईश्वर की अमध्यस्थ अनुभूति की मांग, उस “उत्साही”, “उग्र” प्रयास के साथ जुड़ी होती है जो मनुष्यों की दृष्टि को रोजमर्रा, सामान्य और व्यक्तिगत घटनाओं से हटाकर स्वर्ग की ओर मोड़ने की कोशिश करता है। ऐसा लगता है कि यह प्रयास इस धारणा से प्रेरित है कि मनुष्य ईश्वर को भूल चुके हैं और गंदे नाली में जीने को तैयार हैं। पहले एक समय में मनुष्यों के पास कल्पित धन का एक स्वर्ग होता था, और यह दुनिया उस स्वर्ग से जुड़े होने के कारण अर्थपूर्ण होती थी। उस समय, मनुष्य कभी अपने वर्तमान जीवन में नहीं रुकते थे, बल्कि उस संबंध के धागे के सहारे एक ऐसे दैवीय समय के ओर ऊपर उठते थे जो उनके वर्तमान से परे होता था, एक ऐसी दैवीय सच्चाई की ओर जो एक पारलौकिक शाश्वत समय में स्थित होती थी।
एक पूर्ववर्ती संक्रमण में, स्वर्ग पर टिकी यह दृष्टि नीचे लाई गई — उस पूर्व युग में जहां पारलौकिक विषय के बारे में स्पष्टता थी, उसे एक ऐसी धरती पर लाना पड़ा जो अब तक अनजानेपन के कोहरे में ढकी हुई थी। अनुभव और इंद्रिय ज्ञान में रुचि जागृत हुई और उसे महत्त्व दिया गया।
हेगेल के समय — जिसकी चर्चा भूमिका में की जा रही है — स्थिति पलट गई है। सांसारिक दुनिया में रुचि इतनी प्रमुख हो गई है कि चित्त केवल अमृत की एक बूँद, स्वर्ग की एक झलक के लिए तरसता है। यह तथ्य कि मनुष्य इस सत्य के झलक से ही संतुष्ट हो जाते हैं (जैसा कि पिछले पैराग्राफ में बताया गया), और उसकी अवधारणात्मक खोज की मांग नहीं करते, यह दिखाता है कि चित्त ने कितनी गहराई खो दी है।
इसलिए हम देखते हैं कि हेगेल, जहाँ एक ओर उपदेशात्मक प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना करते हैं, वहीं दूसरी ओर सिर्फ सांसारिकता पर केंद्रित दृष्टिकोण की भी उतनी ही आलोचना करते हैं। यह कोई बाहरी पुरोहित वर्ग नहीं है जो स्वर्ग की ओर मुड़ने की मांग करता है, बल्कि यह चित्त की अंदरूनी कमज़ोरी है जो इस बाहरी मांग के रूप में प्रकट होती है।
यह समझना ज़रूरी है कि हेगेल किसी एक विशेष सोच की कितनी भी आलोचना करें, वह कभी भी एकतरफा नहीं होती है — उनके दार्शनिक पद्दति के कारण (जिसका एक नाम “पूर्ण संशयवाद” है — जिसे बाद में समझाया जाएगा), हेगेल हमेशा किसी विचार की आलोचना करते हुए, उन योग्य बातों को स्वीकार करते हैं जो महत्त्वपूर्ण होते हैं, और उन्हें अपनी अभिव्यक्ति में शामिल कर लेते हैं।
9. बहरहाल, हेगेल का कहना है कि विनयी होना, या बात को अनकही/अधूरी छोड़ना, साइंस के लिए सही नहीं है। जिसे उपदेश चाहिए, वह उसे और कहीं पा सकता है। उल्टा, उसे अपना घमंड जताने के लिए कोई ना कोई मंच मिल ही जाएगा। फ़लसफ़े को इन सब से अलग रहना चाहिए।
10. ईश्वर के अमध्यस्थ ज्ञान में जो आत्मसंतोष होता है, उसे विज्ञान से श्रेष्ठ होने का दावा नहीं करना चाहिए। यह पैग़म्बरी बातें यह मानकर चलती हैं कि वो अंदरूनी गहराई में ईश्वर के साथ केंद्र में स्थित हैं — वह ईश्वर जो अनंत है, जिसकी कोई सीमा (यूनानी में Horos) नहीं है, और जो बाहरी कार्य-कारण से चालित नहीं होता है।
इसलिए ऐसा पैगंबर सोचता है कि वही व्यक्ति/कर्ता (ख़ुद, ईश्वर) और वस्तु (ईश्वर, संसार) की ऐक्यता है; और इसका नतीजा यह होता है कि चिंतन, निर्णयात्मक भेद, विशेषता, और लौकिक ज्ञान — ये सब अनावश्यक माने जाते हैं।
लेकिन जैसे एक रिक्त स्थानिक-विस्तार होता है, जिसमें असंबंधित वस्तुओं को रखा जाता है, वैसे ही एक रिक्त गहराई भी होती है जिसमें “ईश्वर” के साथ अमध्यस्थ ऐक्यता होती है। यह अंध-बल है, जिसका संसार में कोई व्यापक प्रयोग नहीं है। रिक्त स्थानिक-विस्तार और रिक्त गहरायी एक दूसरे के प्रतिच्छवि हैं।
हेगेल कहते हैं कि चित्त की शक्ति उतनी ही होती है जितनी उसकी अभिव्यक्ति। उसकी गहराई उसके अपने पंख फैलाकर मौजूदा यहाँ-और-अभी की विशेषता में समा जाने के साहस के अनुरूप है।
इसलिए जब “ज्ञान” (उपदेशात्मक) विचारों को अवधारणा का रूप देने से इंकार करता है, और एक आकारहीन सरलता का हिस्सा बनना चाहता है (यानी, बिना सोच-विचार वाला मूलतत्व) और इस तरह यह मानता है कि वह “पवित्र” तरीक़े से फ़लसफ़ा कर सकता है—तब वह खुद को धोखा देता है: ईश्वर में बिन-चिंतन आत्मसमर्पण करने की वजह से वह संसार की चीज़ों को मापने और निर्धारित करने से इनकार करता है, और खुद को बिल्कुल बेतरतीब, मनमानी धारणाओं की ओर धकेल देता है।
जब उपदेशक और सीधे-सादे श्रद्धालु ऐसा करते हैं, और सोचने की शक्ति को छोड़कर तर्कहीन अविचारित-अस्तित्व की दलदल में उतर जाते हैं, तो वे यह मान लेते हैं कि वे अब ईश्वर के प्रिय हो गए हैं, और ईश्वर उन्हें नींद में ज्ञान देता है। लेकिन असल में, इस अंधे अनुग्रह से जो कुछ भी वे पाते हैं, वो सपने ही होते हैं।
यहाँ हेगेल सोच-विहीन होने को पूरी तरह से सचेतन नहीं होने के बराबर मानते हैं — यानी, नींद में होना; और इसीलिए नींद में जो “अंतर्दृष्टि” मिलती है, वह वास्तव में केवल एक सपना है। सोचने की मेहनत चित्त का वास्तविकता की दुनिया में जागरूक होना है। वह परम-तत्व के साथ सीधा मिलन नहीं तलाशता है।
11. हेगेल इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि दुनिया (उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में फ्रांसीसी क्रांति और प्रबोधन के बाद) एक बदलाव के दौर में है। चित्त अपने पुराने रूप को छोड़कर खुद को रूपांतरित कर रहा है। वह पुरानी दुनिया से नाता तोड़ चुका है और उस दुनिया को अतीत में विसर्जित करने जा रहा है। चित्त हमेशा आगे बढ़ता है। लेकिन जैसे जब कोई बच्चा पैदा होता है, उसके परिपक्व होने की प्रक्रिया में अचानक एक उछाल आता है, वैसे ही चित्त भी समय की कोख में धीरे-धीरे परिपक्व होता है—पुराने ढांचों को तोड़ते हुए, नई संरचनाओं को गढ़ते हुए। पुरानी दुनिया के जीने के तरीकों की थकावट बस कुछ इशारों में दिखती है—अस्पष्ट अभिव्यक्तियाँ, ऊब, अर्थहीनता का एहसास। एक समय आता है जब पुराना ढांचा टूटता है और नया उजाले में जन्म लेता है। तब चित्त एक बिल्कुल नये चेहरे में प्रकट होता है और सोचने, जीने, और वास्तविकता [जो स्वयं भी बदल रही है] से जुड़ने के नये ढंग पेश करता है।
तो, यहाँ चित्त क्या है? हेगेल ने इसे पैरा 7 में इसकी संरचना की ओर इशारा करते हुए प्रयोग किया, और अब वे इसका विस्तार करते हैं। चित्त सक्रिय होता है—यह पुराने संरचनाओं को बदलता है और नए बनाता है। यह एक जैविक रूप है, जिसे हम 'संस्कृति' कह सकते हैं—जो हमेशा अपने भीतर बेचैनी के साथ बदलता रहता है। ध्यान से देखा जाए तो यह चित्त, कई लोगों के क्रिया में प्रकट होता है: एक समाज या समुदाय, जो एक “हम” है। हालाँकि यह हमेशा किसी व्यक्ति की सोच (और क्रिया) में व्यक्त होता है, चित्त का स्रोत व्यक्ति से बड़ा होता है।
12. लेकिन यह जो एक नयी दुनिया है (देखिए पैरा 11), वह न तो एक परिपक्व रूप में है, और न ही इसका फ़लसफ़ा पूरी तरह से विकसित हुआ है। यह सिर्फ़ इसकी धारणा है (और यहाँ हेगेल धारणा [concept] शब्द का आम मतलब में इस्तेमाल करते हैं), इसका अभिप्राय-मात्र या सम्भावना का नक्शा। यह सिर्फ़ नींव है, इमारत पूरी नहीं बनी है।
और विज्ञान भी (यहाँ, मेरी राय में, विज्ञान हर प्रकार के चिंतनशील सोच का एक अमूर्त सार्वभौमिक रूप है — हर नयी उभरती विधा, और सबसे अहम, तर्क का विज्ञान और चेतना के अनुभव का विज्ञान) अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है —सिर्फ़ विज्ञान की सम्भावना है।
यह नयी शुरुआत पहले सम्पूर्ण हो चुके एक पूरे विकास का नतीजा है; इस पहले विकास का संक्षिप्त, धारणा-रूप है, जो मुकम्मल होकर सामने आने का इंतज़ार कर रहा है। ऐसा है कि पिछला सारा विकास अब एक सघन बीज बन गया है, जो अपने नये अवतार में विकास की राह देख रहा है।
दो टिप्पणियाँ:
पहली, यह नई दुनिया किसी पेड़ की तरह नहीं है, जो केवल अपने जीवन-रूप को थोड़े बदलाव के साथ दोहराता है और जिसमें चिंतन की क्षमता नहीं होती। यह नयी दुनिया इसकी आध्यात्मिक रूप में बड़े बदलाव के साथ खुद को दोहराती है, क्योंकि सिर्फ़ इंसानी दुनिया ही खुद पर विचार करके खुद को बदल सकती है। पुनर्जनमित आध्यात्मिक रूप में विभिन्नताएं इतनी बड़ी होती हैं कि यह नयी दुनिया पहले की दुनिया जैसी नहीं दिखती — फिर भी इसमें अपने स्रोत के अवशिष्ट निशान होते हैं। हेगेल यहाँ प्रबोधन काल में उभरी उस नयी दुनिया की बात कर रहे हैं जो मध्यकालीन दुनिया (जिससे वह निकली है) से अलग है।
दूसरी, हेगेल ‘concept’ (धारणा) शब्द का इस्तेमाल यहाँ आम अर्थ में कर रहे हैं — एक सम्भावित, प्रारंभिक विचार के रूप में, एक संभावना के अमूर्तन में। आगे चलकर, वह अवधारणा (‘concept’) की धारणा को इस तरह विकसित करेंगे कि वह एक प्रक्रिया होगी जिससे ठोस अस्तित्व (मौजूदगी) चिंतन के अमूर्त रूप से गढ़ा जाता है — यथार्थता में ‘होना’ और ‘सार’ का संश्लेष।
13. पिछले पैराग्राफ में हेगेल ने प्रकृति से चित्त की ओर छलांग की तुलना एक बच्चे के जन्म से की थी। यहाँ वह इस उपमा से आगे बढाते हैं और कुछ विस्तार में बताते हैं कि कैसे उभरता हुआ चित्त आम लोगों की सोच में फैलता है।
जैसे बच्चे का जन्म सिर्फ एक संभावना (potential) का प्रकट होना होता है, वैसे ही जो नई दुनिया उभरती है, वह भी सिर्फ एक सीधी-सादी संभावना होती है। पर जो पहले के जानने के रूप हैं, वे अब भी धुंधली याद की तरह मौजूद रहते हैं। जो कुछ नया प्रकट होता है, उसमें साधारण चेतना अभी तक उन अलग-अलग पहलुओं को पहचान नहीं पाती है जो उस नए विषयवस्तु और उसके रूपों को बनाते हैं। इसका कारण यह है कि अधिकतर लोगों के लिए इस नए सोचने के रूप के साथ अन्य पुराने सोचने के रूपों (जो उनके माहौल का हिस्सा है) का तार्किक संबंध अभी तक स्पष्ट नहीं हैं। इस स्तर पर ज्ञान गूढ़ लगता है और कुछ लोगों तक सीमित रहता है। कोई भी बात सब पूरी तरह तभी समझ सकते हैं जब उसके पहलुओं के सारे तार्किक संबंध स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाते हैं; तभी उसे सिखाया जा सकता है, सीखा जा सकता है और वह सबकी साझा मिल्कियत बन सकती है।
सभी के लिए विज्ञान तक पहुँचने का रास्ता तभी खुलता है जब वह पूरी तरह से समझ में आने लायक बनता है — और जब कोई विज्ञान के पास इस माँग लेकर आता है कि उसे समझ के ज़रिये युक्तिपूर्ण ज्ञान मिले, यह माँग जायज़ है, क्योंकि जो जानना चाहता है वह “मैं” है। समझने की माँग, जो असल में स्वयं को समझने की माँग है — यह निरा “मैं” की अभिव्यक्ति के अलावा और कुछ नहीं है। “मैं” नए का अंकुर है।
जब कोई बात वैज्ञानिक और सामान्य चेतना — दोनों के लिए परिचित हो जाती है, तब वह सिखाई जा सकती है। इस तरह अवैज्ञानिक चेतना भी उसे सीखकर वैज्ञानिक सोच और जीवन की संरचनाओं में प्रवेश कर सकती है।
ध्यान रहे कि यहाँ बात चित्त की हो रही है — और इस पैराग्राफ से यह साफ़ होता है कि चित्त ज्ञान और सीखने से ही चालित होता है, यानी (युक्तिपूर्ण) सोच से। लेकिन जो व्यक्ति सोच रहा है, वह प्रमुख नहीं है —जो प्रमुख है, वह है सोच का कुछ व्यक्तियों में, और फिर सब में प्रकट होना । इसलिए शुरुआती रूप में कहा जाए तो, चित्त (कम से कम एक रूप में) सोच है, जो किसी समाज में विस्तृत होता है और लोगों के अपने दुनिया को देखने के विभिन्न तरीकों को आकार देता है।। और, अगर और आगे बढ़ें तो, ऐसी चेतना यह भी तय करती है कि लोग कैसे जीते हैं, कौन-सी रीतियाँ अपनाते हैं, कैसी आदतें बनाते हैं और कौन-से संस्थानों का निर्माण करते हैं। ये सब सोच के युक्तिपूर्ण यथार्थ रूप हैं, जो दुनिया में घटते हैं।
निस्संदेह, हेगेल हर प्रकार के ज्ञान और वैज्ञानिक बनने की प्रक्रिया को लेकर उत्साहित हैं — जो मध्यकालीन दार्शनिकों की सोच से बहुत अलग है। यह प्रवृत्ति लॉक, रूसो और अन्य चिंतकों की उस परंपरा से आती है, जो सोचने और जीने का एक नया लोकतांत्रिक तरीका ढूँढती है।
14. जब कोई विज्ञान जन्म लेता है, यानी कि वह अभी सुप्त ही है, और वास्तव में विकसित नहीं हुआ है, उस की आलोचना की जा सकती है। लेकिन यह कहना कि यह आलोचना इस नए विज्ञान के संभावित और अविकसित सत्व को प्रभावित करती है, अन्याय होगा। साथ ही, आलोचना की यह मांग कि संभावना को स्पष्ट और व्यक्त किया जाए, न्यायसंगत है।
हेगेल यहाँ क्या कहना चाहते हैं?
यदि हम इस नए विज्ञान के जन्म के बारे में पिछले पैराग्राफों को ध्यान से पढ़ें, तो हम देखेंगे कि यह जन्म एक (बौद्धिक) अंतर्ज्ञान से होता है, यह अंतर्ज्ञान कि सत्य हमारे सामने मौजूद चीज़ से कुछ बड़ा है - यानी, हमारे ठोस वस्तु की प्रत्यक्षता से बड़ा है। यह बौद्धिक अंतर्ज्ञान मूलतः युक्तिपूर्ण है; यह युक्ति की अभिव्यक्ति है। यह स्वयं की पिछली सोच की जाँच से उत्पन्न होता है, जो अब तक अचेत है। यहीं से नवजात विज्ञान की अंधी टटोल शुरू होती है।
ऐसे बौद्धिक अंतर्ज्ञान का सिद्धांत शेलिंग ने प्रस्तुत किया था। शेलिंग के अनुयायी बौद्धिक या युक्तिपूर्ण अंतर्ज्ञान की अवधारणा को ईश्वर के प्रत्यक्ष ज्ञान में आस्था की अंतर्ज्ञान के साथ जोड़ने में उत्साहित थे।
लेकिन यह तर्क-संचालित बौद्धिक अंतर्ज्ञान एक और दिशा में—अनुभवजात खोज की ओर — आगे बढ़ता है; अर्थात, यह दुनिया वास्तव में कैसी है? दूसरे शब्दों में, यह बौद्धिक अंतर्ज्ञान समझ की ओर बढ़ने को प्रेरित करता है।
यहाँ इस नए विज्ञान के निर्माताओं और उसके आलोचकों के बीच दो पक्ष हैं: समझ (सोच की बाहरी प्रेरणा) और युक्ति (सोच की भीतरी प्रेरणा)।
एक तरफ़, डियिस्टों की युक्ति की अवधारणा नए विज्ञान की युक्तिहीनता की आलोचना करती है और “अपनी अमध्यस्त तर्क और दिव्यता पर ज़ोर देती है”। दूसरी तरफ़, समझ अपनी नई अनुभवजात जानकारी की नुमाइश करती है, लेकिन फिर शक, डीइस्टों का दबाव और अपनी ही नासमझी के अहसास से थक कर चुप हो जाती है — उसे लगता है कि वह जिस दुनिया का अध्ययन कर रही है, उसके बुनियादी सवालों को वह अब भी नहीं समझ पाई है। समझ फिर भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है—वह इन जायज़ माँगों को अभी किसी तरह से पूरा नहीं कर सकती है। उसकी चुप्पी का कारण डीइस्टों की “पूर्ण सत्य” के मांग की दोहराव से ऊब भी है और उनके दावे पूरे न होने से निराशा भी।
दूसरे शब्दों में, हेगेल यह कह रहे हैं कि हमें बौद्धिक अंतरज्ञान और दुनिया को समझने के बीच के चक्रीय (द्वन्द्वात्मक) संबंध को समझना होगा। और वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि केवल इसी आगे-पीछे चलने के हरकत से हम उस सत्य—जो हमारे दुनिया के बारे में सबसे महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि है—के पास पहुँच सकते हैं।
15. यहाँ पहले दिये गए तर्क को आगे बढ़ाते हुए, हेगेल कहते हैं कि “दूसरा पक्ष” क्या करता है (और जैसा कि पिछले पैराग्राफ़ में बताया गया है, “दूसरा पक्ष” तर्कवादी और ईश्वर के सीधे अनुभव में विश्वास करने वाला है)।
ये लोग अपनी व्याख्याओं में विभिन्न विषयवस्तुओं को आसानी से शामिल कर लेते हैं। वे बहुत से उपलब्ध जानकारी अपने तर्कों में शामिल कर लेते हैं।
टिप्पणी: हेगेल यहाँ “content” (विषयवस्तु) और “material” (विचार/सामग्री/जानकारी) जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं (अंग्रेज़ी अनुवाद में), और जैसा कि हेगेल कहीं और कहते हैं, इन शब्दों का अर्थ “substance” (मूलतत्व) से अलग है। हम मूलतत्व के बारे में बाद में सही संदर्भ में बात करेंगे। लेकिन यहाँ विषय-वस्तु और विचार/सामग्री/जानकारी से मतलब है – वो परिचित, सुलझी हुई बातें – जो पहले ही सोच-विचार द्वारा पचायी जा चुकी हैं।
यह विचार/सामग्री/जानकारी जाना-पहचाना होता है, लेकिन उसमें कुछ ऐसी विसंगतियाँ होती हैं जो प्रचलित सोच या सिद्धांतों में फिट नहीं बैठते हैं। “दूसरा पक्ष” इन अपरिचित विषयों पर भी ध्यान देता है और उन्हें भी अपने हथियारों में शामिल कर लेता है – जिससे ऐसा लगता है कि उसे ना सिर्फ़ वह सब कुछ आता जो पहले से ज्ञात है, बल्कि उससे भी ज़्यादा ज्ञान है (यानी कि उन अनुभववादियों से ज़्यादा – जो इस संदर्भ में हेगेल के हीरो हैं)।
वे इस तरह से एकत्रित किये गये सुलझे हुए विचारों को “परम प्रत्यय” (Absolute Idea) के अधीन कर देते हैं और दावा करते हैं कि उनके पास मनुष्य के अस्तित्व का एक पूर्ण रूप से विकसित “विज्ञान” है।
परम प्रत्यय क्या है? यह हेगेल की सोच का एक जटिल मूल विचार (अवधारणा) है, लेकिन फिलहाल इतना समझना काफी है कि हेगेल के लिए “परम प्रत्यय” वह मुख्य संभावना का स्रोत है जो धीरे-धीरे एक परिपूर्ण, तर्कसंगत, और दृढ़ यथार्थता में विकसित होता है। लेकिन हेगेल के मित्र और समकालीन शेलिंग (Schelling) और उनके अनुयायियों के अनुसार “परम प्रत्यय” एक सिद्धि है – एक रहस्यमय, अनजानी गहराई जो स्वाधीनता और चित्त का दिव्य स्रोत है। यह वह अँधेरापन है जो मानव के बनने का जड़ है, जिसमें भेद/विविधता (इन शेलिंगियों के अनुसार) अर्थहीन है। यह ज्ञान का वह मूल रूप है जो सारे “विज्ञान” को एक करता है।
हेगेल “परम प्रत्यय” शब्द का उपयोग शेलिंग की उस धारणा के लिए करते हैं जिसे शेलिंग के अनुयायियों ने सतही सरलता के साथ पेश किया है। इस तरह विभिन्न संदर्भों में किसी शब्द का अस्पष्ट प्रयोग (शेलिंग का “परम प्रत्यय”, अनुयायियों का उसका उपयोग/गलत उपयोग, और अंत में हेगेल का अपना परम प्रत्यय) जिनके बीच अंतर करने का कोई साफ़ संकेत नहीं हैं, हेगेल को समझना बहुत कठिन बना देता है!
तो ये शेलिंगवादियों ने अनुभववादियों से ली गई पहले से पची हुई जानकारी, और उनके अपने सतही ढंग से इकट्ठी की गई विसंगतियों को एकत्रित करके “परम प्रत्यय” में शामिल किया और दावा किया कि उनके पास ही सच्चा ज्ञान है।
लेकिन हेगेल कहते हैं कि अगर हम देखें कि यह सारी जानकारी “परम प्रत्यय” में कैसे शामिल की गयी है, तो यह स्पष्ट होता है कि यह जानकारी “प्रत्यय” की अंदरूनी तर्क से (जैविक रूपांतरण द्वारा) नहीं जुड़ी हुई है – और यहाँ हेगेल अपने प्रत्यय की धारणा को लाकर शेलिंगवादियों की आलोचना करते हैं। असल में यह एक बाहरी, यंत्रवत दोहराव है, जहाँ एक ही सिद्धांत को बिना बदले बार-बार पेश किया गया है – जिससे एक ऊबाऊ बनावट बनता है जो दिखने में जितना भी विविध लगे, वास्तव में वैसा नहीं है।
अगर प्रत्यय दुनिया के संपर्क में आकर बदलता नहीं है, तो वह जैसा शुरू में था वैसा ही बना रहता है – उसे प्रस्तरिभूत (hypostatize)कर दिया गया है। जब शेलिंगवादी “ज्ञानी” (जो तर्कवादी है और जिसे सत्य का सीधा अनुभव होता है) दुनिया के सारे विषयों को इस रुके हुए पानी में डुबोकर पेश करता है (और यहाँ शायद हेगेल व्यंग्य से इसे गंदा पानी, लगभग नाली का पानी, कहना चाहते हैं), तो जो हमें मिलता है वह उतनी ही बेकार है जितनी कोई भी सतही, मनमानी व्याख्या – क्योंकि दर असल वह असली मुद्दे को आत्मसात नहीं करता।
यह उस प्रत्यय से बहुत दूर है (जैसा कि हेगेल उसे समझते हैं) जो विविध रूपों से निकलकर तर्कसंगत मेल के ज़रिए खुद को गढ़ता है। बल्कि यह एक ‘एकरंगी औपचारिकता’ है – जो किसी भेद को तभी देख पाती है जब वह भेद किसी और (अनुभववादी) के द्वारा पहले ही तैयार किया गया हो और इसलिए पहचाना हुआ लगता है। और जैसा कि अगला पैराग्राफ़ बताएगा, यह एकरंगी रीतिवाद अंत में सारे भेदों को मिटाकर एक समतल एकरूपता में बदल देता है, जिसमें किसी चीज़ की अलग पहचान नहीं होती है।
16. हेगेल पहले के १५ पैराग्राफों के तर्क को अंतिम चरण तक ले जाते हैं — पुरानी दर्शन-व्यवस्था की आलोचना और अपने विचार की भिन्नता की शुरुआत।
टीकाकार एच. एस. हैरिस के अनुसार, पिछले पैराग्राफ में रीतिवाद का ज़िक्र शेलिंग के दो अनुयायियों — रेनहोल्ड और बार्डिली — की ओर सीधा इशारा था। इन दोनों ने दो सूत्र पर आधारित एक पद्धति का निर्माण किया था:
१) सोचना और अस्तित्व अभिन्न हैं।
२) क = क, यानी हर धारणा अपने आप से अभिन्न और स्थिर है।
शेलिंग के अनुयाईयों के अनुसार ये दो सिद्धांत किसी भी दर्शन की नींव हैं।
हेगेल की आलोचना यह है कि अभिन्नता-रीतिवाद के समर्थक यह दावा करते हैं कि जो इन दोनों सूत्रों को नहीं समझता, उसे परम-तत्व का दृष्टिकोण प्राप्त नहीं हो सकता।
इससे पहले, ह्यूम ने अपने संशयवादी अनुभववाद में यह दावा किया था कि अगर किसी स्वीकृत व्याख्या की कोई और विकल्प व्याख्या हो सकती है, तो पहली व्याख्या खारिज की जा सकती है — जैसे कारण और परिणाम का रिश्ता वस्तुगत तथ्य नहीं हैं, बल्कि केवल सोचने का आदतन ढंग है।
कान्ट ने अपने मूल विश्वास (कारण और परिणाम वस्तुगत सच्चाइयाँ हैं) पर झटका महसूस किया, और अपनी प्रमुख रचना क्रिटीक ऑफ प्यूर रीज़न में उन्होंने ह्यूम के वस्तुगत तर्क के खिलाफ आपत्तियों को बदल कर एक नया और बेहतर तर्क प्रस्तुत किया, मसलन, चित्त की संरचना ही वास्तविकता को अर्थ देती है।
हेगेल का तर्क है कि इन दोनों विपरीत लेकिन ग़लत विचारधाराओं (एक ओर रेनहोल्ड और बार्डिली, दूसरी ओर ह्यूम) में हम देखते हैं कि सार्वभौमिक प्रत्यय (यानी सत्य) एक अमूर्त, वास्तविकता रहित चीज़ बन जाता है — जिससे हर भेद और स्पष्टता निष्काषित किये जाते हैं। रेनहोल्ड और बार्डिली के पद्धति में भिन्नता को “खालीपन की खाई” में फेंक दिया गया है, और वहाँ से किसी भी चीज़ को अवधारणात्मक रूप से सिद्ध करने या विकसित करने की ज़रूरत नहीं होती है। इसे ही “निरूपणात्मक दृष्टिकोण” के नाम से प्रस्तुत किया गया।
हेगेल इन ग़लतियों को व्यंग्यात्मक ढंग में प्रस्तुत करते हैं:
किसी चीज़ को कह देना ही उस चीज़ को परम-तत्व में अस्तित्व देने के लिए काफ़ी है (यानी वह सत्य है)। लेकिन जैसे ही वह चीज़ परम-तत्व में पहुँचती है, अभिन्नता-सूत्र (क = क) लागू होता है और वह चीज मिट जाती है, क्योंकि परम-तत्व में सब कुछ अभिन्न है।
यह औपचारिक अभिन्नता-तर्क (रेनहोल्ड और बार्डिली का) केवल इस मामूली और तुच्छ सूत्र (क = क) को तोते की तरह दोहराता है, और इसका विरोध उस सतर्क चिंतन से करता है जिसे हेगेल आवश्यक मानते हैं जिसके ज़रिए किसी अवधारणा को वास्तविकता में परिपूर्णता मिले। यह पद्धति बस यह दावा करती है कि उसका “परम-तत्व” वह अंधेरा है जिसमें सारी गायें काली हैं (यानी सब एक जैसा है)। हेगेल के लिए यह पद्धति एक ऐसी बचकानी अवस्था में है जो पूरी तरह से खोखली है।
इस रीतिवाद की निंदा पहले हेगेल और शेलिंग दोनों ने की थी, लेकिन यह अब शेलिंग के अनुयायियों में फिर से उभर आया है। और यह ग़लती तब तक नहीं सुधरेगी जब तक यह स्पष्ट न हो जाए कि परम यथार्थता को जानना क्या होता है। यहीं पर हेगेल शेलिंग से अलग हो जाते हैं: हेगेल शेलिंग के परम तत्व के बारे में उस अंतर्दृष्टि से सहमत हैं और मानते हैं कि यह एक अहम उपलब्धि है, लेकिन यह कहना काफी नहीं है कि वह “संरचना” भी है और “खाई” भी। यह समझना ज़रूरी यह है कि दर्शनिक विचार की मेहनत से उस खाई को किस प्रकार संरचना बनाया जाता है।
और यहाँ हेगेल भूमिका के अगले हिस्से की ओर बढ़ते हैं — यह बताते हुए कि वह अब क्या करने जा रहे हैं: यह दिखाना कि यथार्थता किस तरह अवधारणा के अनुसार स्वयं को ढालता है। और ऐसा करते हुए वह कुछ गलतफहमियों के जाले से भी निपटना चाहते हैं।
17. हेगेल यहाँ अपने पहले ही वाक्य में कुछ बहुत महत्वपूर्ण तर्क पेश करते हैं:
“.…सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सत्य को सिर्फ द्रव्य के रूप में नहीं, बल्कि उतना ही व्यक्ति-कर्ता के रूप में भी समझा और व्यक्त किया जाए।”
इससे कई सवाल पैदा होते हैं।
1. “सब कुछ” का मतलब क्या है?
यहाँ “सब कुछ” का मतलब है जानना/होना—उसके परम अवधारणात्मक पहलू में। इस ज्ञान की सटीकता और उसकी वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि सत्य को किस प्रकार समझा जाता है।
2. “सत्य” क्या है?
यहाँ “सत्य” से आशय है — सत्ता पर विचार की सही पकड़; यानी कि यथार्थता के अनुरूप विचार की सटीकता; और इस वाक्य की अनकही बात है अवधारणात्मक रूप में समझना। और यही हेगेल के दर्शन का एक महत्वपूर्ण शब्द है — अवधारणा।
फिलहाल इतना ही कहा जाए कि अवधारणात्मक सोच वास्तविकता को जानने का एक ढंग है, जो सक्रिय, ढलने/ढालने वाला, आत्म-परिवर्तनशील और बराबर ज़्यादा सही होते जाने वाला है। यह इस बात पर ज़ोर नहीं देता कि वास्तविकता का कोई अपरिवर्तनीय, तादात्म्यात्मक (स्वयं-से-अभिन्न) सार है, जिसे किसी स्थिर परिभाषा में बाँध लिया जा सके। आगे हेगेल का तर्क यह होगा कि अवधारणा सिर्फ एक अमूर्त विचार बनकर नहीं रहती, बल्कि वास्तविकता को ही रूपांतरित करती है।
3. अब, “सत्य को सिर्फ द्रव्य के रूप में नहीं, बल्कि उतना ही व्यक्ति/कर्ता के रूप में भी समझना” का मतलब क्या है? हेगेल के लिए सत्य की अवधारणा जैविक है। इसका मतलब यह है कि वे सत्य को एक ऐसे सावयव रूप में देखते हैं जो स्वयं को रूपांतरित करता रहता है।
इस संदर्भ में “substance” को द्रव्य कहना ठीक नहीं है, क्योंकि द्रव्य से हम एक जड़, अपरिवर्तनीय पदार्थ समझते हैं। यहाँ “substance” स्वयं जीवन है — या ऐसा कहना बेहतर होगा कि यह जीवन का आधार है, इस लिए इसे हम मूलतत्व कहेंगे। यह वह है जो बढ़ता है, विकसित होता है और अपने भीतर से स्वयं को बदलता है।
लेकिन इस रूपांतरण की प्रक्रिया में (जिसे अभी इतिहास, यहाँ तक कि पूर्व-इतिहास भी नहीं कहा जा सकता) एक समय ऐसा आता है जब मूलतत्व एक गुणात्मक छलाँग लगाता है। उसके अस्तित्व का ढंग ही बदल जाता है। हेगेल के अनुसार यही व्यक्ति/कर्ता का जन्म है।
मूलतत्व और व्यक्ति/कर्ता में फर्क यह है कि व्यक्ति/कर्ता में चित्त अपने आत्म-ज्ञानी रूप में प्रकट होता है। जीव के अन्य रूप सिर्फ जीते हैं और जैविक रूप से बदलते रहते हैं; उन्हें इस बदलाव का ज्ञान नहीं होता। इसके विपरीत व्यक्ति/कर्ता एक आत्म-ज्ञानी आत्म-परिवर्तन है। जिस तरह फल फूल की जगह ले लेता है, उसी तरह चित्त जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है। चित्त जीवन का वह रूप है जो खुद को एकल व्यक्ति के रूप में भी जानता है और सार्वभौमिक के रूप में भी। उदाहरण के लिए, एक घोड़ा खुद को और अपनी इच्छाओं को एक व्यक्तिगत जीव के रूप में जानता है; लेकिन वह विश्व में “घोड़ा” प्रजाति या “घोड़ापन” के प्रतिनिधि के रूप में खुद को नहीं पहचान सकता। इंसान का चित्त ऐसा कर सकता है। वह खुद को एक साथ व्यक्ति और सार्वभौमिक — दोनों रूपों में प्रस्तुत कर सकता है। चित्त की यही खासियत, जब उसके जैविकता के साथ जुड़ती है, तब उसका बढ़ता हुआ अवधारणात्मक और तार्किक रूपों का (द्वंद्वात्मक) विकास पैदा होता है।
इस लिए सत्य को सिर्फ मूलतत्व के रूप में नहीं, बल्कि उतना ही व्यक्ति/कर्ता के रूप में भी देखना होगा: यानी कि यह समझना कि “प्रकृति” — मतलब दुनिया की वस्तुगतता/वह जो हमारे सामने है — खुद एक गतिशील, आत्म-परिवर्तनशील सत्ता है। इंसान (जानने/होने वाला) के उद्भव के बाद यही सत्ता अपने प्रति सचेत हो जाती है और इंसान के सार्वभौमिक चिंतन के ज़रिए अपने रूपांतरण को खुद सचेत रूप से साकार करती है।
अपने दूसरे वाक्य में हेगेल यह स्पष्ट करते हैं कि जब हम सत्य को सिर्फ मूलतत्व ही नहीं, बल्कि उतना ही व्यक्ति/कर्ता के रूप में भी समझते हैं, तब यह याद रखना चाहिए कि मूलतत्व खुद अपने अंदर सार्वभौमिक या परम सत्य को संभावना के रूप में (या कहें कि एक अविकसित आत्मा के रूप में) पहले से ही शामिल किए रहता है।
यानी कि व्यक्ति/कर्ता की संभावनाएँ पहले से ही मूलतत्व के अंदर मौजूद हैं। व्यक्ति/कर्ता कोई मौलिक रूप से अलग या स्वतंत्र सत्ता नहीं है।
जब हेगेल कहते हैं कि मूलतत्व अपने अंदर सार्वभौमिक को शामिल करता है, तो उनका आशय यह है कि उसमें जानना (सक्रिय व्यक्ति/कर्ता, प्रक्रिया) और होना (जड़, जो जानी गई है) — दोनों शामिल हैं।
व्यक्ति/कर्ता का उद्भव, मूलतत्व से चित्त का उभरना है जिसके ज़रिए चित्त का सचेत, आत्म-सचेत, ग्रहणशील और चिंतनशील रूप बनता है।
इस तरह सोच, या सत्ता के विषय में चिंतन करना, या उसका सिद्धांतीकरण करना, उभरते हुए व्यक्ति/कर्ता का सक्रिय आत्म-रूपांतरण है।
इसके बाद हेगेल सत्य को समझने के उन अन्य तरीकों की चर्चा करते हैं जिन्हें उनके पूर्ववर्ती दार्शनिकों ने पेश किया था (यहाँ हम H. S. Harris [1997] की व्याख्या का अनुसरण कर रहे हैं):
(क) बरुच स्पिनोज़ा ने ईश्वर को एकमात्र द्रव्य माना — वह सत्ता जिसमें सब कुछ मौजूद है। इस विचार ने उनके समकालीनों को गहरा झटका दिया। वजह यह थी कि अगर ईश्वर को सिर्फ शुद्ध द्रव्य माना जाए, तो उसमें (ईश्वर की) व्यक्तिपरकता, इरादा, ज्ञान, सक्रियता और आत्म-चेतना के लिए कोई जगह नहीं बचती। या यूं कह सकते हैं कि, हेगेल के अनुसार स्पिनोज़ा की ईश्वर की अवधारणा आध्यात्मिक नहीं था। उसमें बदलाव के लिए कोई जगह नहीं थी ।
(ख) स्पिनोज़ा के विपरीत, लेकिन उन्हीं की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, गॉटफ्रिड विल्हेम लाइबनिज़ ने दुनिया को आत्म-ज्ञानी, सक्रिय इकाइयों से निर्मित माना। ये इकाई शुद्ध व्यक्तिपरक केंद्र हैं। उनके सामने कोई “अन्य”, कोई सत्ता, कोई वस्तुपरक सत्य नहीं है। ये इकाई ईश्वर (परम व्यक्ति/कर्ता, जो निरंतर, अपरिवर्तित रूप से सक्रिय है) के प्रतिबिंब हैं। पर यहाँ मामला उलट जाता है — यहाँ सिर्फ व्यक्ति/कर्ता है, द्रव्य नहीं; और ऐसा बदलाव जो कहीं नहीं पहुँचता। इस तरह यह दृष्टिकोण भी आत्म-रूपांतरित होते हुए चित्त को उतना ही कम समझ पाता है, जितना स्पिनोज़ा का द्रव्य-सिद्धांत।
(ग) तीसरा दृष्टिकोण, जो स्पिनोज़ा और लाइबनिज़ दोनों की सीमाओं से आगे बढ़ने का एक सचेत प्रयास था, वह फ्रेडरिक विल्हेम जोसेफ शेलिंग के तादात्म्य-दर्शन[3] का था। बेशक यह आगे बढ़ने के लिए सही कदम था।
जैसा कि हैरिस लिखते हैं:
“स्पिनोज़ा ने बौद्धिक अंतर्दृष्टि को परिभाषित किया; योहान गॉटलीब फिक्टे ने दिखाया कि उसका वस्तुपरक रूप होना संभव नहीं है, बल्कि वह व्यक्तिपरक मेहनत का ध्येय होना चाहिए; शेलिंग ने इसे निहित रूप से सुलझाते हुए दिखाया कि सैद्धांतिक रूप से बौद्धिक अंतर्दृष्टि मुमकिन है।” (Harris, p. 55)
लेकिन हेगेल के मुताबिक, क्योंकि उस समय तक बौद्धिक अंतर्दृष्टि की अवधारणा अभी विकसित नहीं हुई थी, इसलिए (यहाँ शेलिंग के) परम सत्य का स्रोत एक ऐसा अतल खाई है, जिसमें कोई भेद स्थापित नहीं किया जा सकता।
यह सत्य की अवधारणा के विकास को वहीं रोक देता है और इस तरह शेलिंग का दर्शन स्पिनोज़ा और लाइबनिज़ के सोच से आगे नहीं बढ़ता।
अगर सही तरीके से आगे बढ़ना है, तो यह तार्किक रूप से समझना होगा कि मूलतत्व, जो शुरू में जीवन का एक अविभाजित, अचेत रूप था, उस में से व्यक्ति/कर्ता कैसे उभरता है। यह उभरना बौद्धिक अंतर्दृष्टि के किसी आकस्मिक दिव्य प्रकाश के रूप में नहीं, बल्कि सोच की मेहनत के ज़रिए होता है।
यही सोच की मेहनत, या सक्रिय चिंतन, या विकासमान अवधारणा, अंत में परम ज्ञान के रूप में अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करेगी।
18.यह एक और बहुत सघन पैराग्राफ है, जिसमें कई महत्वपूर्ण विचार एक साथ, चारों तरफ से उमड़ आते हैं।
हेगेल यहाँ यह और स्पष्ट करते हैं कि जीवित मूलतत्व ही सत्ता है, जो सत्यतः व्यक्ति/कर्ता है। दूसरे शब्दों में, सत्ता वास्तव में तभी यथार्थ होती है, जब वह ज़िंदा हो और अपने को स्थापित करे; यानी कि वह अपने अंदर एक विभाजन, एक अलगाव के ज़रिए खुद को देखती है, जहाँ वह एक व्यक्ति/कर्ता के रूप में उभरती है। यह वह प्रक्रिया है, जिसके ज़रिए वह मानो खुद को विभाजित करती है, और वह (अपना एक भाग) अपने (दूसरे भाग के) लिए अन्य बन जाता है।
ऊपर इस्तेमाल किया गया यथार्थ शब्द यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है। हेगेल के दर्शन में यथार्थ का अर्थ “वास्तव” से अलग है। वास्तविकता का वह पहलू, जो तार्किक रूप से संगत हो, इतिहास में किसी हद तक स्थिर हो, और जिसके अंदर किसी ज़्यादा विकसित या “बेहतर” अवस्था की ओर बढ़ने की चाहत हो —उसी को हेगेल यथार्थ कहते हैं। इसमें वह सब शामिल नहीं होता जो सिर्फ संयोगवश घटित हो, आकस्मिक हो, या जो दूसरी आकस्मिक परिस्थितियों की वजह से गायब हो जाता हो। इसलिए जब हेगेल कहते हैं कि “सत्ता तब यथार्थ होती है जब वह खुद को स्थापित करती है”, तो उनका आशय यह है कि जब मूलतत्व, एक जीवित, चैत्तिक (यानी कि चित्त से संबन्धित) सत्ता के रूप में, खुद को तार्किक ढंग से व्यक्त करने की ओर बढ़ता है, तब वह व्यक्ति/कर्ता बन जाता है। या ऐसा कहा जा सकता है कि वह मानव-चिंतन के ज़रिए खुद को व्यापक मूलतत्व से अलग करता है। इस तरह नवजात शिशु की चेतना, प्रकृति के विद्यार्थी जो अलग खड़े होकर उसका मनन करती है, वैज्ञानिक जो सवाल उठाती है, और विद्रोही जो आज्ञाकारियों से अलग खड़ी हो जाती है—ये सभी मूलतत्व की उसी प्रक्रिया के रूप हैं, जिसमें वह खुद को विभाजित करके अपने ही शरीर से ऐसे व्यक्ति/कर्ता को जन्म देता है, जो सोच सके, मनन कर सके, सवाल उठा सके और/या मौजूदा हालात को नकार सके।
इस तरह व्यक्ति/कर्ता निरा नकारात्मकता है—नकारात्मक मूलतत्व है जो वैसा बनने से इनकार करता है, जैसा उसके बनावट में नियत है। यही वह आज़ादी है, जो मजबूरी से पैदा होती है। और इस नकार में मूलतत्व की उसी मंथन से एक दुहराव, एक विभाजन पैदा होता है। शुरु में यह विभाजन सिर्फ एक मामूली विविधता को जन्म देता है—एक साधारण, अचिंतित “नहीं”। लेकिन अगले चरण में यही शुरुआती विद्रोह अपने को और अपनी सीमाओं को उसी मूलतत्व में प्रतिबिंबित देखता है, जिससे वह अलग हुआ था। उन्हें देखकर विद्रोही—अर्थात यह नकारात्मकता—एक बार फिर नकारता है और उस मूलतत्व के अंदर एक आलोचनात्मक तत्व के रूप में लौटता है। यह नकार का नकार हेगेल के दर्शन की वह मूलभूत हरकत है, जो व्यक्ति/कर्ता को शुरुआत की ओर वापस ले जाती है। उदाहरण के लिए पिकासो को लें। बचपन और युवावस्था में उन्होंने यूरोपीय पुनर्जागरण के सभी महान चित्रकारों का अनुकरण किया, उनकी शैली में बड़ी कुशलता हासिल की और पारंपरिक तैल-चित्रकला में बेहतरीन कृतियाँ रचीं। इसके बाद वे शास्त्रीय चित्रकला के खिलाफ बगावत के कई दौर से गुज़रे। आखिर में वे फिर ऐसी रेखांकन-शैली की ओर लौटे, जिसमें एक बच्चे (या गुफ़ाओं की दीवारों पर चित्र बनाने वाले आदिम कलाकार) जैसी तकनीकी और दृश्य-बोध की मासूमियत दिखाई देती है। लेकिन यह लौटी हुई मासूमियत अब चित्रकला के पूरे इतिहास और उसके खिलाफ हुए बगावत की यात्रा के अर्थ से भरपूर होती है।
इसी तरह दूसरा नकार “खुद को फिर से कायम करने वाली समानता” है। यह ऐसी एकता है, जो पहले नकार के पहले मूलतत्व की स्थिति में लौट जाना नहीं है। बल्कि यह मध्यस्थित , सोची समझी, आलोचनात्मक चेतना की मूलतत्व में वापसी है, जो इस मूलतत्व को व्यक्त करती है और उसकी संरचना को तर्कपूर्णता से यथार्थ बनाती है। इसीलिए हेगेल कहते हैं कि सत्य स्वयं का बनना (यानी कि आत्म-रूपांतरण) है—यानी मूलतत्व का व्यक्ति/कर्ता बनना, जो आखिर में मूलतत्व के साथ अपनी सोची समझी समानता को फिर से कायम करता है। यह एक चक्राकार हरकत है, जिसमें एक विकसित स्तर पर अंजाम फिर से शुरुआत होता है।
19. इस पैराग्राफ़ में हेगेल फिर से सजीव मूलतत्व की उस धारणा की आलोचनात्मक जाँच करते हैं, जिसे सबसे पहले स्पिनोज़ा ने आखिरकार ईश्वर के रूप में प्रस्तुत किया था। स्पिनोज़ा के अनुसार ईश्वर को जानने का मार्ग “अन्तर्ज्ञानात्मक विज्ञान” (scientia intuitiva) था। लेकिन हैरिस (1997) का मानना है कि यहाँ हेगेल का इशारा फ्रेडरिक शिलर की तरफ भी है।
शिलर, फिख्ट, शेलिंग और कई दूसरे बुद्धिजीवी उस महत्वपूर्ण बौद्धिक धारा का हिस्सा थे जिसे जर्मन रोमांटिक आन्दोलन कहा जाता है। दर्शन, साहित्य, विज्ञान और कला का यह आन्दोलन उन्नीसवीं शताब्दी और उसके बाद तक जर्मनी के जीवन, राजनीति और संस्कृति को गहराई से प्रभावित करता रहा। हेगेल भी इसी आन्दोलन के एक प्रमुख दार्शनिक थे।
लेकिन क) शेलिंग और फिख्ट, जो स्पिनोज़ा के बौद्धिक सहज-ज्ञान के विचार से मानो मोहित हो गए थे, और ख) शिलर की कुछ नीरस, सिर्फ उपदेशात्मक बातें — इन दोनों से अलग, हेगेल ने बौद्धिक सहज-ज्ञान की एक नई दिशा पेश की। यहाँ परम की प्राप्ति किसी अंतर्दृष्टि की कौंध या सिर्फ घोषणा से नहीं होती; वह नकार की मेहनत के रास्ते से ही होती है।
पिछले पैराग्राफ़ में हेगेल ने नकार की अवधारणा को रेखांकित किया था। नकार वह है जिसके ज़रिए व्यक्ति/कर्ता मूलतत्व से उभरता है। और हेगेल के अनुसार नकार एक कड़ी मेहनत है, जिसके ज़रिए संभावना की यथार्थता में तबदीली होती है।
अब “मेहनत” अपने आप में एक मानवीय धारणा है, और यही “मैं” के व्यक्ति/कर्ता के रूप में उभरने का संकेत भी है। नकार जीवन और चित्त दोनों की धारणा है। और ईश्वर को सिर्फ मूलतत्व नहीं बल्कि व्यक्ति/कर्ता के रूप में समझना है (इसके शुरुआती रेखांकन के लिए पैराग्राफ़ 17 देखें)। और यह भी समझना है कि ईश्वर का रूप मनुष्य के रूप का भी आधार है। इस लिए व्यक्ति/कर्ता के रूप में ईश्वर, “अन्य” यानी कि दुनिया से सरोकार रखता है। उसका कार्यकलाप सिर्फ अपने ही छवि के साथ खेलने तक सीमित नहीं हो सकता। उसके व्यक्ति-कर्तापन का काम यह है कि वह संभावना को यथार्थता में बदले। ईश्वर को “अन्य” के अलगाव के परे समझना है।
और ऐसे हेगेल अपने जर्मन रोमांटिक समकालीनों की उस धारणा की आलोचना करते हैं जिसमें ईश्वर अपने-आप-में है, और पूरी तरह से अपने में सिमटे हुए और आत्म-मग्न है। हेगेल के अनुसार यह एक अमूर्त समझ है। इसके विपरीत, हेगेल के लिए यही ईश्वर (यानी कि सजीवता का रूप, सजीव मूलतत्व से उत्पन्न व्यक्ति/कर्ता, प्रत्यय) स्वयं को यथार्थ बनाने वाला अस्तित्व है — यानी कि अवधारणा ही है।
इस तरह, ईश्वर को सिर्फ मूलतत्व मानना काफी नहीं था; उसे व्यक्ति/कर्ता के रूप में समझना दर्शन का एक निर्णायक कदम था। लेकिन सिर्फ इतना भी काफ़ी नहीं है कि लाइबनिज़, फिख्ट और शेलिंग की परम्परा में ईश्वर को व्यक्ति/कर्ता कहा जाए, और फिर उसे सिर्फ “अपने ही साथ खेलने वाला” बताकर यह मान लिया जाए कि उसे किसी सहज अनुभूति की कौंध से जाना जा सकता है। इसकी वजह यह है कि अगर ईश्वर को ऐसा अपने-आप-में रहने वाला अस्तित्व माना जाए जिसका अन्य से कोई संबंध या सरोकार न हो, तो वह फिर एक अमूर्त सार बनकर रह जाता है, जिसमें जैविकता (जो अपने-लिए होना, यानी कि नकार, और व्यापक रूप से रूप का स्व-चालन) को नज़रंदाज़ किया जाता है।
यहाँ हेगेल 'रूप' की अवधारणा को 'सार' की अवधारणा से अलग करते हैं। सार एक अमूर्तता है, जबकि रूप स्व-चालित यथार्थीकरण है, और यह, हेगेल जिसे अवधारणा कहते हैं, उसका एक पहलू है। ईश्वर को जानने के लिए रूप के विकास के ज़रिए यथार्थता के बाहुल्य के विस्तार को समझने की कड़ी मेहनत करनी होगी।
यहाँ हेगेल के तर्क की अंतर्निहित प्रवाह काम कर रहा है। इसे जैविकता के एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर बरगद का बीज अपने-आप-में है, तो उसके अंदर संभावना और सार मौजूद हैं, जो आगे चलकर यथार्थ बनते हैं।
बीज का पेड़ बनना उसी सार का विकास है—उस बरगद के संभावना का यथार्थ बनना।
लेकिन बीज का यह सार ही पूरी सच्चाई नहीं है। पूरी सच्चाई उस सम्पूर्ण प्रक्रिया में है जिसमें नकार और उदात्तीकरण (बीज–अंकुर–पेड़—फूल–फल और फिर बीज) के ज़रिए वह सार विकसित होता है, संघर्ष करता है, अपने विशेष वातावरण और उसकी सीमाओं के अंदर एक खास पेड़ बनता है, और फिर उसी खासियत से अगला बीज पैदा करता है। नवजात शिशु, विज्ञान, दर्शन और ईश्वर की अवधारणा से जुड़ी बहसें, यहाँ दिए गए बरगद के पेड़ के उदाहरण की तुलना में कहीं ज़्यादा जटिल हैं।
20. “सत्य संपूर्णता है।” यह सबसे आसानी से पहचाना जाने वाला हेगेलीय कथन है। तो यह संपूर्णता क्या है? यह वह प्रक्रिया है जिससे सार अपने ही विकास के ज़रिए खुद को मुकम्मल करता है, और इस तरह मुकम्मल हुई संपूर्णता उस विकास की यथार्थता है। संपूर्णता वह है जो यथार्थ बनती है — यानी कि मज़बूत और सुसंगत रूप से वास्तविक; यहाँ उसकी मज़बूती अपने ही अंतर्निहित तर्क से कायम रहने वाले एक गतिशील संतुलन की है। यह वो है जो बनता है, यानी कि व्यक्ति/कर्ता है, और जो खुद बनता है (यानी कि अपनी अंतर्निहित संभावना को साकार करता है)। इस तरह, हेगेल के लिए, परम-तत्व को शुरुआती दौर के रूप में समझना काफी नहीं है; वह वास्तव में वह है जो उसके विकास का परिणाम है।
यह कहना कि परम-तत्व, यानी कि ईश्वर, परिणाम है, शुरुआत नहीं, एक विरोधाभास-सा लगता है—ईश्वर हर चीज़ का परिणाम, ना कि शुरुआत, कैसे हो सकता है, जब कि सभी धर्म ईश्वर को सत्ता का मूल-स्रोत मानते हैं? लेकिन हेगेल कहते हैं कि थोड़ा विचार करने पर यह समस्या सुलझ जाती है।
यहाँ हेगेल एक दिलचस्प कदम उठाते हैं। सार्वभौम वह है जो सब कुछ समेटता है—लेकिन हेगेल के यहाँ सार्वभौम दो प्रकार के है—अमूर्त और मूर्त (इस भेद पर हम आगे चर्चा करेंगे)। शुरुआत सिर्फ वह है जिसे हम अमूर्त सार्वभौम कह सकते हैं। यहाँ एक बहुत मोटे-मोटे और सिर्फ सांकेतिक उदाहरण में, “सभी पशु” जैसा अमूर्त सार्वभौम या शब्द प्राणिविज्ञान को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता; उसके लिए विकसित विवरण ज़रूरी है।
इसी तरह (और यहाँ हेगेल अपने तर्क को एक जटिल स्तर की तरह बढ़ाते हैं) ईश्वर, दैवी या परम-तत्व जैसे शब्द अपने अंदरूनी सुसंगत विषयवस्तु को व्यक्त नहीं करते—वे सिर्फ नाम हैं। मुश्किल यह है कि जब ऐसे नामों को बहुत ज़्यादा अहमियत दिया जाता है, तो वे अमध्यस्थ अंतर्बोध की धारणा को बढ़ावा देते हैं: यानी कि वे हमें यह मानने के लिए बढ़ावा देते हैं कि सिर्फ उस शब्द को कह देने से ही हम उसमें निहित समूचे सत्य को पहले से जान लेते हैं। वे हमें यह मानने के लिए प्रेरित करते हैं कि ईश्वर या परम-तत्व की धारणा को स्पष्ट करने या विकसित करने के लिए किसी खुलासे की ज़रूरत नहीं है। जब “ईश्वर” को अमध्यस्थ परम-तत्व के रूप में लिया जाता है, तो ईश्वर का कोई भी निर्धारण (नाम से तर्क-वाक्य की ओर बढ़ना) परम-तत्व के अंदर किसी बाहरी तत्व को ले आता हुआ दिखाई देता है। इसलिए वह निर्धारण मूल, अविभेदित एकता, यानी कि संपूर्णता, में ही शामिल हो जाता है।
इनवुड (2018) इस पैराग्राफ पर अपनी टिप्पणी में प्लॉटिनस और थॉमस एक्विनास को ऐसे विचारकों के रूप में नामित करते हैं जिन्होंने ईश्वर के गुणों को या तो हटा दिया, या उन्हें स्वयं ईश्वर में ही वापस समेट लिया, ताकि उसकी निर्मल महिमा, यानी कि ईश्वर की उस पवित्रता को बनाए रखा जा सके जिसमें वह समूचे सत्ता का स्रोत है। इनवुड के आधार पर हम यह अनुमान कर सकते हैं कि सिर्फ ऐसे ही ये विचारक इस धारणा को सही ठहरा सकते थे कि अंतर्बोध अमध्यस्थ है — इसी तरह उन्हें ये यकीन था कि हम सोच के बिना जान सकते हैं।
पिछले पैराग्राफ में इस्तेमाल किया गया शब्द “अमध्यस्थ” का अर्थ “इस क्षण” या “अभी” नहीं है, बल्कि सोच के ज़रिए मध्यस्थित न किया हुआ, अ-तार्किक: यह ऐसे अंतर्बोध को व्यक्त करता है जो बिना किसी मध्यस्थ के हमारे मन में आ जाता है। मध्यस्थता का सिलसिला — परम-तत्व का निर्धारण करना, उसके आगे विधेय लगाना और उसके बारे में तर्क करना—ऐसी हरकत है जिससे इन विचारकों को नफरत है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे ईश्वर के सत्य के बारे में उनके अंतर्बोध की अमध्यस्थता और पवित्रता दूषित हो जाती है। यह दृष्टिकोण सोच से ही छुटकारा पाना चाहता है। ऐसा लगता है मानो मध्यस्थता या सोच पर निर्भरता परम संज्ञान के भ्रष्ट हो जाने का कारण बनती हो। या ऐसा कहा जा सकता है कि वे उस कौंध से प्राप्त बोध को पकड़े रहते हैं कि परम-तत्व निर्मल है, जिसमें सब कुछ एक ही है — एक अविभेदित परम-तत्व जिसमें कोई भेद स्थापित नहीं किया जा सकता।
संक्षेप में, हेगेल कहते हैं कि ईश्वर को एक अमध्यस्थ, प्रथम, के रूप में देखने की धारणा एक ऐसी आस्था-आधारित अंतर्दृष्टि का परिणाम है जो सोच से अपने उस अंतर्दृष्टि को दूषित नहीं करना चाहती। हेगेल की इस दृष्टिकोण पर आपत्ति यह है कि हम ईश्वर को ठीक से तभी समझ सकते हैं जब हम ईश्वर क्या है, उसके बारे में सोचें — यानी कि जब हम परम-तत्व के अर्थ को मध्यस्थता के ज़रिए समझें। यहाँ तक हमने सोच के व्यक्तिपरक पहलू को जांचा है।
लेकिन पैराग्राफ के पहले हिस्से में हेगेल यह भी कह रहे हैं कि वस्तुगत रूप से, सत्य संपूर्णता है — बरगद के पेड़ का पूरा आवर्तन ही संपूर्णता है, और इसी तरह परम-तत्व का आवर्तन भी संपूर्णता है। यहाँ हेगेल का सुझाव है कि हमारी व्यक्तिपरक सोच वस्तुपरक विकास की प्रक्रिया का अनुसरण करे। उसे उसी तरह यथार्थता के साथ एक हो जाना चाहिए, जिस तरह बरगद का सार विकसित होकर बरगद मुकम्मल होता है। यानी कि, बरगद का “प्रत्यय” उसके बीज पर बाहर से आरोपित कोई रूप नहीं है, बल्कि वह विकास है जिसके ज़रिए उसके बीज की संभावनाएं पूरी तरह से यथार्थ हो जाती हैं। इसी तरह, परम सत्य-प्रत्यय उस प्रक्रिया का पूर्ण विकास और असली विषयवस्तु है जिसके ज़रिए ईश्वर की व्यक्तिपरक अवधारणा वस्तुगत परम-तत्व के स्व-चालित विकास के साथ एक हो जाती है—यानी कि ईश्वर शब्द में अंतर्निहित संभावना के (वस्तुगत) अवधारणाकरण का परिणाम (जैसे बीज की संभावना बरगद में यथार्थ होती है)। परिणाम प्रक्रिया के बाद उसमें बाहर से जोड़ दी गई कोई चीज़ नहीं है; प्रक्रिया को उसकी पूर्ण यथार्थता में समझना ही परिणाम है।
21. अमध्यस्थ अंतर्दृष्टि की लालसा रखने वालों में विचार की ओर नफरत के बारे में अपनी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए, हेगेल अब इस को सिर्फ धिक्कारते ही नहीं, बल्कि उस पर विचार करते हैं। विचार, या मध्यस्थता क्या है, उसके बारे में गलतफहमी से उसके लिए नफरत पैदा होती है।
मध्यस्थता क्या है? — यह चिंतन है, यानी कि स्व-चालित-स्व-समान होना; दूसरे शब्दों में, यह नकार या आत्म-रूपांतरण है, मतलब बनना है, जहाँ मैं खुद चिंतन करता है। अगर हम सोच के सभी विधेयों को (यानी कि हर संभव परिस्थिति में उसकी हर विषयवस्तु को) हटा दें, तो जो चिंतनशील मैं बचता है, वह एक सरल, (खुद से अलग) जैविक बनना है, जो अन्य के साथ एक नए संबंध में होता है—उसके अन्य की बूझ उसका रूपांतरण करता है।
अगर हम इस प्रक्रिया को—इस नकार को, या बनने को—देखें, तो यह जीवन की मूल प्रक्रिया है, यानी कि चित्त है: नकार परम-तत्व की आहट है; यह ईश्वर का कदम है। यह ईश्वर का सबसे अमध्यस्थ रूप है—सिर्फ एक स्थिर सत्ता नहीं, बल्कि खुद को रूपांतरित करने वाली, स्व-चालित, उद्देश्यपूर्ण सत्ता — यानी कि व्यक्ति/कर्ता का रूप। हेगेल के तर्क के निहितार्थ को और निर्णायक रूप से सामने रखें तो यह समझना होगा कि यह गलतफहमी है कि चिंतन मानवीय मध्यस्थता के ज़रिए ईश्वर की धारणा को बिगाड़ती है; असल में चिंतन ईश्वर की अमध्यस्थ अभिव्यक्ति है।
इस लिए अगर सत्य परम-तत्व है, तो सत्य से चिंतन (प्रतिवर्तन) को बाहर कर देना विचारशीलता को गलत समझना होगा। चिंतन/नकार/बनना/व्यक्ति-कर्ता ही असल में परम-तत्व का मर्म, उसका सार है।
अमध्यस्थ अंतर्दृष्टि के पक्षधर जिस बात से डरते हैं, उसके विपरीत, यह बनना, यह चिंतन, उस सत्य को असत्य नहीं बनाता, जिसकी कल्पना एक सरल के रूप में की जाती है। वास्तव में, नकार जब अपने चक्र से पूरी तरह गुजरती है, तो वह उच्चतर स्तर पर सरलता तक पहुँचती है। भ्रूण अपने-लिए मनुष्य नहीं है—वह सिर्फ अपने-आप-में मनुष्य है (एक संभावना के रूप में)। विकसित तार्किकता ही संभावना को यथार्थता में बदलती है—यानी कि वह अपने-आप-में-होने को अपने-लिए-होने में बदल देती है।
यह अपने-लिए-होना, जहाँ तक कि वह दुनिया में रहती है, चिंतन और क्रिया की एक सरल एकता है। व्यापक रूप से, इसका परिणाम सरल अमध्यस्थता होता है—ठीक वही जिसकी अमध्यस्थ अंतर्दृष्टि के पक्षधर बुरी तरह से चाहते हैं—क्योंकि जब चिंतन परम-तत्व के अनुसार आगे बढ़ता है, तो वह जो उसका विरोध करता है, जिसे वह असत्य के रूप में देखता है, उसे खारिज नहीं करता; बल्कि उसे अपने में समाकर उसके साथ सामंजस्य बनाये रखता है। परम-तत्व केवल प्रक्रिया के रूप में नकार ही नहीं है, बल्कि वह अपने अंदर सारी नकारता को शामिल करता है। इस तरह यह सरलता अपने-आप-में-और-अपने-लिए-होना है।
बीज सिर्फ सरल शुरुआत नहीं है, बल्कि बरगद के पेड़ के जटिल विकसन का सरल परिणाम है। इसी तरह, राज्य, प्रथाओं/संस्थाओं/उद्देश्यों के जटिल समूह से उभरने वाली एक सरल एकता है।
53. हेगेल, विज्ञान की प्रणाली — यानी तार्किक-वैचारिक दर्शन — को समझ से अलग करते हैं। अब तक उन्होंने समझ को एक तरह के निर्जीव नामपट्टी लगाने के रूप में आलोचनात्मक ढंग से परिभाषित किया है (जैसे एक कंकाल के हिस्से जिनसे मांस हटा दिया गया हो, या जैसे दुकान में चिप्पियाँ लगी मसालों के डिब्बे जिन्हें खोला नहीं जा सकता)। यह आलोचना कांट के अनुयायियों द्वारा समझ की जो बिगड़ी छवि पेश की गई, उस पर है; न कि स्वयं कांट या ह्यूम द्वारा पेश किये गए जटिल विचारों पर। हालांकि यह बिगड़ा रूप उन्हीं के द्वारा सुझाए गए संभावनाओं से उपजा है।
समझ के विपरीत, हेगेल के विज्ञान को स्वयं अंदर से संगठित करना पड़ता है, उस अवधारणा के जीवित हरकत के अनुसार, जो यथार्थता में प्रकट होती है। सबसे पहले, अवधारणा स्वयं को विभाजित करती है, अन्य बनती है — इस प्रकार वह अपने संरचना में निहित अंतर्वस्तु को व्यक्त करती है। फिर दूसरे चरण में, वह इस विभाजित अंतर्वस्तु को वापस अपने में समेट लेती है और उसे अपने ही समग्र रूप का एक साधारण, जाना पहचाना हिस्सा बना लेती है।
इसका एक प्राथमिक उदाहरण जीवन से लिया जाए—पेड़ तना और पत्ता निकालता है, अपने जीवन-क्रम में स्वयं को विभिन्न रूपों में बाँटता है, और फिर इन्हीं भेदों को फिर अपने अंदर समेट लेता है — तना और पत्ता इसके अपने निश्चित भाग बन जाते हैं।
एक विकसित उदाहरण के तौर पर, अगर हम वस्तुगत चित्त में किसी क़ानून को लें, तो वह क़ानून पहले चरण में किसी विसंगति को अपने से अलग करता है; फिर दूसरे चरण में उस विसंगति को एक निश्चित पहलू के रूप में वापस अपने में सोख लेता है। इस तरह वह अधिक व्यापक क़ानून बन जाता है जो बेहतर अभिव्यक्ति द्वारा उस विसंगति को भी अपने में शामिल कर लेता है। पहले चरण में यह नकार (या नकारात्मकता) एक अन्य को विसंगति के रूप में अलग करता है। दूसरे चरण में यह अन्य, क़ानून के विषय-वस्तु में सिमट जाता है। जो पहले एक खलने वाली विसंगति थी और जिसे विस्तार से सुलझाना था, वह अब क़ानून का एक सामान्य उदाहरण बन जाती है।
इसके बाद इतिहास की क़ानून में विसंगति को हल करने की यह मेहनत एक कक्षा में पढ़ाया जानेवाला पाठ बन जाता है — एक निश्चित सरलता।
यही वह तरीका है जिसमें किसी भी मौजूदगी (क़ानून, पत्ता, शिक्षा का विषय-वस्तु, किसी धर्म का सांप्रदायिक भेद) की अंतर्वस्तु स्वयं में प्रकट होती है — न कि किसी बाहरी निरीक्षक द्वारा उस पर थोपा गया ठप्पा या वर्गीकरण के रूप में।
हेगेल पहले कहते हैं कि समझ अपनी तालिकाबद्ध कल्पना में उस ठोस और जीवित हरकत जिसको वह क्रमबद्ध करती है, उसकी व्याख्या नहीं करती है; फिर पलट कर वे कहते हैं कि समझ इस हरकत को देखती ही नहीं — वह इससे अनजान है। अगर वह इस हरकत से परिचित होती, तो समझ जाती कि यह ठप्पा लगाना, किसी पुस्तक की विषय-सूची की तरह, एक गौण प्रक्रिया है। समझ की अज्ञानता सिर्फ विषय-सूची पेश करती है, न कि असली विषय-वस्तु।
हेगेल अपने समय के चुंबकत्व के ज्ञान का उपयोग करते हुए (जो जरूरी नहीं कि ग़लत हो), कहते हैं कि समझ चुंबकत्व को किसी वस्तु (जैसे लोहे के टुकड़े) के निर्जीव विशेषण के रूप में देखती है — न कि स्वयं लोहे के भीतर पैदा हुए एक भिन्नता के रूप में। यह भिन्नता लोहत्व की अपनी सक्रिय स्वयं-मे-होने को अभिव्यक्त करती है। समझ इस जीवित अंतर्वस्तु को उन लोगों के लिए छोड़ देती है जो “कल्पना” या “अनुमान” करना चाहते हैं।
समझ किसी विशिष्टता को जांचकर उसे एक मृत भिन्नता का नाम देती है — यह जाने बिना कि वह विशिष्टता असल में है क्या। इसके विपरीत, वैज्ञानिक संज्ञान (या तार्किक-वैचारिक दर्शन) “वस्तु के जीवन” में समर्पित होने की आकांक्षा करता है —यानी कि, उस विशेष तरीके से खुद को अभिव्यक्त करने की आंतरिक आवश्यकता पर ध्यान देता है। यह ऊपर से कोई वर्गीकरण नहीं थोपता। बल्कि, यह ऊपर से सर्वेक्षण करने की उस आदत को छुड़ा देता है, जो वस्तु पर अपने अहम की बाहरी छाप छोड़ने की कोशिश होती है। इसके बजाय, यह हर स्तर पर अवधारणा के अनुसार स्वयं को व्यक्त करता है और साथ ही साथ वस्तु की जड़ आकारहीनता से एक वैयक्तिक रूप को बाहर लाता है (यह चर्चा अगले पैराग्राफ में जारी रहेगी)।
इस मौके पर यह ध्यान देना ज़रूरी है कि हेगेल यहाँ चित्त और वस्तु — दोनों के बारे में बात कर रहे हैं, समझ से निर्मित व्यक्ति/कर्ता और वस्तु के भेद के परे। उनका इशारा यह है कि चूँकि यथार्थ ही युक्तियुक्त है, इसलिए तार्किक-वैचारिक दर्शन का काम यथार्थ की तर्कसंगति को समझना है — उसके साथ चलते हुए, न कि उस पर बाहरी रूप से अपना अहं थोपते हुए।
इस तरह से, वैज्ञानिक संज्ञान खुद ही अपने भीतर लौट आता है, लेकिन यह तभी होता है जब यथार्थ की तर्कसंगति स्वयं एक नए संतुलन में आ जाए — अपने पिछले विरोधों को समेटते हुए (जैसे सांविधिक कानून और वाद विधि) — और एक सरल, विन्यस्त यथार्थ बन जाए — एक उच्चतर सत्य।
इस तरह, व्यक्ति/कर्ता और वस्तु दोनों ही उस “स्वयं को सर्वेक्षण करने वाले समग्र” में एक हो जाते हैं। यह समग्र उस बारीक विवरणों की संपदा से निकलता है जिसमें पहले सोच उलझी हुई प्रतीत होती थी।
<पैराग्राफ 22-53 का अनुवाद किया जा रहा है और तैयार होने पर उन्हें अपडेट कर दिया जाएगा।>
54. पैराग्राफ 17 से हेगेल यह स्पष्ट करते आ रहे हैं कि मूलतत्व अंदरूनी रूप से कर्ता/व्यक्ति है (यह भी, कि कोई ऐसा व्यक्ति/कर्ता नहीं है जो मूलतत्व के बाहर कहीं और से आता हो या अलग हो)। इसीलिए सारी विषयवस्तु, मूलतत्व का अपने में व्यक्ति/कर्ता के रूप में प्रतिवर्तन (प्रतिबिंब और चिंतन रूप दोनों में ही) के अलावा और कुछ नहीं है। कोई भी होना या मौजूदगी, इसलिए होता है कि वह आत्म-समरूप, आत्म-समान है। उसमें ऐसी पहचान या सीमा होती है जिसके तहत वह क = क के कसौटी पर खरा उतरता है। अगर वह ऐसा न करे — यानी कि क = अ-क हो — तो उसका परिचित अस्तित्व भंग हो जाएगा। लेकिन यह आत्म-समानता या आत्म-पहचान एक अमूर्तन है — यह उस चिंतन-प्रक्रिया का परिणाम है जो जीवन के प्रवाह में से कुछ विशेषताओं को छाँट निकालता है। इसलिए हेगेल का कहना है कि आत्म-पहचान, या मौजूदगी, या सिर्फ होना — वास्तव में चिंतन है; यह सोच का परिणाम है।
हेगेल के तर्कशास्त्र के अनुसार गुण वह है जो एक मौजूदगी को दूसरे से अलग करता है। इसलिए कोई वस्तु उसके विशिष्ट गुण की वजह से एक अस्तित्व या मौजूदगी मानी जाती है। गुण ही किसी परिचित वस्तु की आत्म-पहचान को चिह्नित करता है। लेकिन गुण सोच है। इसलिए, होना चिंतन का निर्धारितता है — जो कुछ भी स्थिर रूप से आत्म-समान है, वह ऐसा सिर्फ सोच में और सोच के ज़रिए होता है। हेगेल उस “अनवधारित चर्चा” को नकार देते हैं जिसमें होना और चिंतन के बीच अभिन्नता की सतही बात की जाती है (शायद यह किसी अमूर्त आदर्शवाद के ओर इशारा है?)।
क्योंकि जब कोई मौजूदगी अपनी अंतर्निहित आत्म-उन्नयन या बनने की प्रक्रिया से विच्छिन्न होकर एक स्थिर अस्तित्व बन जाता है, तब उसकी यथार्थता से अमूर्तन होता है — और यह अमूर्तन उसके बनने के अलावा और कुछ नहीं है। यह अमूर्तन पहले से ही उस यथार्थता को स्थिर बना देता है, और उसे एक ऐसी आत्म-समान अस्तित्व में बदल देता है जो अपनी परिवर्तनशीलता से अलग हो चुकी होती है। यह मौजूदगी, अमूर्तन, और विभाजन —यह संपूर्णता जो है की प्रकृति है; अर्थात् यह होने और ज्ञान की स्वाभाविक संरचना है।
ज्ञान, जिस मौजूदगी से अपने को अलग करता है, उसी में तैरता रहता है — इसलिए जानना कोई बाहरी प्रक्रिया नहीं है जिसे बाहर खड़ा कोई व्यक्ति-कर्ता करता है; यह कोई सिर्फ अपने-लिए-होना नहीं है जो विषयवस्तु से अपने को अलग कर ले। विज्ञान (यहाँ तार्किक-वैचारिक विज्ञान, न कि समझ जिसकी हेगेल आलोचना कर रहे हैं) —विषयवस्तु से हटकर अपने भीतर लौटने वाला प्रतिवर्तन नहीं है; वह “आत्म-निश्चितता” को थोप देने वाला कोई सिद्धांतवाद नहीं है। क्योंकि यहाँ ज्ञान, जो तार्किक-वैचारिक है, यह देखता है कि विषयवस्तु के भीतर का मंथन एक निश्चित रूप में स्थिर हो गया है (पैराग्राफ 53 के अंत में इसका संकेत है), वह यह भी देखता है कि उसका खुद का जानना एक व्यक्तिपरक क्रिया है जो उसी विषयवस्तु में घुल-मिल जाती है — और इस तरह वह एक नया, ठोस अस्तित्व बन जाती है। यह विषयवस्तु का अंतर्निहित प्रकृति है — वही जो व्यक्तिपरकता के ज़रिए मूलतत्व को स्वयं की जानकारी देती है; और साथ ही, यह वही व्यक्ति-कर्ता का रूप अपने भीतर लौटता है, मूलतत्व से अलग होकर, किसी और अवसर पर फिर उससे जुड़ने के लिए।
जानना, तार्किक-वैचारिक रूप में, तर्क की चालाकी है —जिससे लगता है कि वह सिर्फ देख रहा है, पर कुछ कर नहीं रहा; लेकिन असल में वह देखता है कैसे एक निश्चित अस्तित्व खुद को बनाए रखता हुआ दिखता है, जबकि वह इसका विपरीत काम करता है: वास्तव में, खुद को खत्म करके एक बड़ी सम्पूर्णता का हिस्सा बनाते हुए सार्वभौमिकता की ओर बढ़ता है।
हेगेल इस पैराग्राफ में एक बात को नहीं दोहराते, लेकिन यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि कोई विशेष वस्तु, जो किसी गुण से चिह्नित होती है, वह एक व्यापक सम्पूर्णता का हिस्सा सोच के ज़रिए बनती है। यह विभाजन ही है —मौजूदगी का अपने आप से अमूर्तन। हेगेल के “बाखनालिक उत्सव” के अगले चरण में यह दोनों (सोच के ज़रिए मौजूदगी का नया रूप; और वह व्यक्ति-कर्ता जिसने इस बनने की प्रक्रिया में, सोच के ज़रिए, इस नए मौजूदगी को संभव बनाया) फिर एक बार अलग हो जाते हैं।
55. हेगेल याद दिलाते हैं कि पहले के कई पैराग्राफ़ोंमें, उन्होंने समझ की भूमिका को मूलतत्व की स्वचेतनता (यानी कि बनने की एक निराकार चित्त*)* के संदर्भ में देखा है। पैराग्राफ 54 में हम समझ की भूमिका को मूलतत्व की एक मौजूदगी या वस्तु के संदर्भ में देखते हैं, जो कोई और वस्तु नहीं, बल्कि खुद है। यही उसे वह मौजूदगी बनाता है जो महज़ है। यानी कि, यह स्व-समानता है, या अस्तित्व का क=क होना। अगर कोई चीज़ स्व-समानता या अपनी पहचान नहीं बनाए रखती, तो वह बिखर जाती है। लेकिन , जैसा कि पिछले पैराग्राफों में हमने देखा है, स्व-समानता ही एक को दूसरे से अलग करती है; यही उसका गुण है। और परिघटनाशास्त्र की भाषा में कहा जाए तो, यही निश्चित सोच या निश्चित सरलता है। हेगेल के अनुसार यह निश्चितता, स्व-समानता, मौजूदगी की समझ है।
इस कथन को दो तरह से देखा जा सकता है — (1) यह हमारी मौजूदगी के बारे में समझ है; और (2) यह वस्तुगत समझ या मेधा है जो मौजूदगी को उसकी गुणवत्ता देती है। यही वह है जिसे यूनानी दार्शनिक अनाक्सागोरस ने नूस (nous) का नाम दिया था, जो अस्तित्व का सार था। हर चीज़— पत्थर, नदी, पौधे, पशु, मनुष्य —सब का अपना आंतरिक तर्क है, और वही उनका नूस है: यानी किसी बड़े संपूर्णता का हिस्सा बनकर रहना।
उनके उत्तराधिकारियों (प्लेटो और एरिस्टॉटल आदि) ने इस मौजूदगी का सार या नूस को और अधिक निश्चितता से आइडोस या प्रत्यय के रूप में अवधारित किया।
हेगेल समकालीन रोमांटिक प्रवृत्ति की आलोचना करते हैं, जो प्ररूप को “सत्य-प्रत्यय”[4] की पराकाष्ठा के लिए अयोग्य मानती है — यानी कोई मौजूदगी “सत्य-प्रत्यय” की उत्कृष्टता तक पहुँच ही नहीं सकती। लेकिन, वे कहते हैं, प्रत्यय प्ररूप से न ज़्यादा न ही कम है, यानी कि दोनों एक हैं। इसीलिए यूनानी-लैटिन शब्दों का उपयोग करने की प्रवृत्ति हुई, ताकि आम धारणाओं को रहस्यमय बनाया जा सके, मन को ‘नैतिक ज्ञान’ से भरपूर किया जा सके, और उसे अज्ञानता में लपेटा जा सके।
क्योंकि मौजूदगी में एक गुणवत्ता होती है जो उसे प्ररूप में चिन्हित करती है, यह एक सरल वैचारिक-निश्चितता है। यह नूस है, और नूस ही सरलता है—वह मूलतत्व (यहाँ ‘आधार’ के पुराने दार्शनिक अर्थ में), जो स्थिर और स्व-समान दिखता है। लेकिन यह स्व-समानता ही नकारात्मकता है —कोई स्थिर मौजूदगी हम से यह कहता है: “मैं यह हूँ, वह नहीं”। वास्तव में यही नकार मौजूदगी के विघटन की असली वजह भी है। यहाँ हेगेल का इशारा नकारात्मक स्व-संबंध की तरफ़ है। पहले तो लगता है कि यह नकार बाहर की तरफ़ है, किसी दूसरे मौजूदगी की तरफ़ (जैसे हिरण शेर नहीं है), और यह भी लगता है कि वह दूसरा पहले को किसी बाहरी शक्ति की तरह मिटा देता है (उदाहरणतः शेर हिरण को खा जाता है)। लेकिन, सरल सोच, जहां तक कि वह सोच है, पहले से ही आंतरिक रूप से नकारात्मक है। कोई भी निश्चित अस्तित्व अपने अंदर कई नकार रखती है, जो उसे विशिष्ट और जटिल बनाते हैं। इस तरह, समझ की सरलता के भीतर ही जटिलता बसी है, जो किसी मौजूदगी को उसकी गुणवत्ता के ज़रिए उसकी पहचान देती है। यह सरलता दर-असल सोच की आत्म-गतिशीलता या उसकी जैविकता का एक पहलू है। यहाँ समझना ज़रूरी है कि हेगेल, होना, बनना और निश्चित होना — इन सब पर उस प्रसंग में बात कर रहे हैं, जिसे आम तौर पर वस्तुगतता कहा जाता है। वे यहाँ हमारी सोच की बात नहीं कर रहे हैं।
इसलिए समझ कोई स्थिर चीज़ नहीं है — यह एक युक्तिपूर्ण बनना है, और इसके साथ ही समझ युक्तियुक्तता में घुल जाती है और खुद युक्तियुक्तता बन जाती है। यानी कि यथार्थ को समझने की प्रक्रिया में, हम मूलतत्व के जैविक हरकत और उसके व्यक्ति-कर्ता बनने के प्रक्रिया में भाग लेते हैं, और इस प्रकार उसकी जैविक युक्तियुक्तता का हिस्सा बन जाते हैं। एक हेगेलवादी दार्शनिक को समझ और तर्क के बीच लोहे की दीवार नहीं खींचनी चाहिए। समझ स्व-फर्ककारी के ज़रिए तर्क बन जाती है।।
56. जो कुछ भी मौजूद है, वह अपने भीतर ही वैचारिक निर्धारितता के रूप में अपनी अवधारणा से रचा हुआ है (आज की भाषा में कहें तो उसका जेनेटिक कोड जैसा): यही मौजूदगी का स्वभाव है। सब कुछ में यही अन्तर्निहित अवधारणा है जो तार्किक अनिवार्यता कहलाती है – जीवन का लय, यानि समग्र सजीवता का तालमेल। यही यथार्थ का तर्कसंगत होने का बुनियादी पहलू है।
“.…यह विषयवस्तु का ज्ञान है, जहां तक कि स्वयं विषयवस्तु ही अवधारणा और सार है—या सिर्फ वही विचारात्मक है।”
संपूर्णता की यह तर्कसंगतता विषयवस्तु का दैवीय ज्ञान (मानवीय या व्यक्तिगत ज्ञान नहीं) है । यह वास्तविकता की तर्कसंगतता ही है। किसी चीज़ की विषयवस्तु या अर्थपूर्णता—उसकी गुण, मात्रा आदि के रूप में—एक ओर तो उसका तार्किक सिद्धांत का अमूर्तन (उसका सार्वभौमिक सार) है, और दूसरी ओर उसी वस्तु में अवधारणा का रचा होना है (उसके विकास की सुप्त संभावना के रूप में)। हेगेल इसे विचारात्मक कहते हैं: यानी कि उस सोच का स्वरूप, जिसे चित्त सत्य की दिशा में ले जाता है। यह मूलतत्व का ठोस रूपायन है जिससे वह एक सरल निर्धारितता बनता है—एक ऐसा विभाजन और रूपायन जो उसकी निराकारता को तार्किक रूप देता है—एक सरल रूप जो अपने-आप-में-होने के रूप में मौजूद है।
यही वजह है कि कोई बाहरी रूप को थोपने की ज़रूरत नहीं है—रूप पहले से ही वास्तविक है: वह एक निश्चित विषयवस्तु है जो मूलतत्व की स्व-व्यक्ति-करण में उभर के आती है। इस तरह रूप का अर्थ उसके सामान्य अर्थ से अलग हो जाता है —अब उसका अर्थ “ठोस विषयवस्तु का स्वचालित बनना” है।
57. इस पैराग्राफ में हेगेल, पिछले पैराग्राफों में प्रस्तुत अपने मूल तर्क की व्यवस्थित व्याख्या को स्पष्ट करते हैं।
वैज्ञानिक प्रक्रिया की प्रकृति यही है कि वह अपने विषयवस्तु से जुदा न हो। वह अपनी चाल और लय ख़ुद तय करता है। विचारात्मक दर्शन इसे ठीक से प्रस्तुत करता है। —इस व्याख्या की भ्रमात्मक सरलता को ठीक से समझने की ज़रूरत है:
i) वैज्ञानिक तरीके की प्रकृति वही है जो उसकी विषयवस्तु की है। विज्ञान का स्वभाव — यानी उसकी जैविकता या उसका जीवन — दो पहलुओं में होता है:
a) उसकी आत्मा, जो एक सक्रिय सम्भावना है; और b) वह वास्तविकता, जिसके अनुसार यह आत्मा अपने को सिद्ध करती है। यह तरीका और लय, उस (दैवीय) सोच की तर्कसंगत खोज है, जो अपने को वास्तविक अभिव्यक्ति में परिपूर्ण करना चाहता है। पिछले पैराग्राफ का तर्क यह है कि यही वास्तविकता की विषयवस्तु की विचारात्मक[1] हरकत है।
ii) विचारात्मक दर्शन इसी हरकत को इंसानी सोच में ठीक से सामने लाने का सही तरीका है। विचारात्मक दर्शन चित्त की आत्म-अभिव्यंजना है —जहां वह मूलतत्व को व्यक्ति-कर्ता में बदलने की प्रक्रिया को पूरी करता है।
ये वाक्य हेगेल के दर्शन की अवधारणा को व्यक्त करते हैं (मॉडल या धारणा के सरल अर्थ में), पर ये सिर्फ़ अग्रिम संकेत के अलावा कुछ नहीं हो सकते हैं। इसकी सच्चाई एक अलग स्तर पर है, और इसलिए इस स्तर पर न इसे पूरी तरह साबित किया जा सकता है और न झुठलाया। इसे आगे विस्तार से विकसित करना होगा (इस और अगली किताब में)।
जब लोग इस दर्शन के इस संरचना से पहली बार टकराते हैं, तो खंडन या दावे तुरंत सामने आते हैं। a) खंडन – सिर्फ एक अनजान विचार के प्रति पहली प्रतिक्रिया होती है — अविचारात्मक सोच की वह कमज़ोरी जिसकी वजह से वह अपनी अहमियत और आज़ादी बचाए रखना चाहती है; और बेहतर तरीके से सोचने के प्रति प्रतिरोध। b) दावे – जो उग्र घोषणाओं (जैसे फ़्रांसीसी क्रांतिकारियों की) के स्वागत में दिए जाने वाले शाबाशी के तरह हैं।
58. हेगेल अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए हमें बताते हैं कि विज्ञान के अध्ययन में फलसफे का तरीका क्या है: दर्शन को अपने कंधों पर “अवधारणा की मेहनत” को उठाना होता है। उनके मुताबिक इसका मतलब है, ‘सरल’ निश्चितता पर ध्यान देना: अपने-आप में होना, अपने-लिए होना, स्व-समान होना, वगैरह। इन्हें ‘आत्मा’ का नाम दिया जा सकता है, पर वे आत्माओं से कहीं अधिक हैं (क्योंकि आत्मा सिर्फ अन्तर्निहित सम्भावना होती है, जबकि ये चित्त की हरकत में अवधारणाएँ हैं)।
एक ओर, तस्वीरों और प्रतिरूपों के साथ सोचने की आदत जब अवधारणा से बाधित होती है, तब उसे यह रुकावट खटकती है। दूसरी ओर, रूपात्मक सोच — जो वास्तविकता से कटे हुए अमूर्तन में सीमित है — वह भी इसी तरह नाखुश होती है। चित्र-चिंतन की आदत को “वस्तुगत चिंतन” कहा जा सकता है — यह शब्द हेगेल में विशेष प्रयुक्त नहीं होता, पर इसका मूल अर्थ यह है: ऐसा चिंतन जो वस्तुओं के अमध्यस्थ रूप में फँसा हुआ है। यह एक खास तरह की चेतना है जिसे नीरे विचार के स्तर पर चलने में दिक्कत होती है।
तर्क-चातुर्य (या नीरा अमूर्त चिंतन) वह घमंडी सोच है जो विषयवस्तु का उपहास करती है और जड़हीनता में ही तुष्ट रहती है। अवधारणात्मक सोच, विचारात्मक फलसफा या विचारात्मक[5] का अनुसरण करने का अर्थ है (पैराग्राफ 56 और 57 देखिए) अपनी मनमर्ज़ी से सोचने की “स्वतन्त्रता” को त्यागना; और विषयवस्तु को अपनी सोच के अनुसार चलाने के बजाय, अपनी सोच की स्वतन्त्रता को उसी विषयवस्तु में विलीन कर देना। अर्थात विषयवस्तु को अपने आप से, अपने भीतर से स्वतः चलने देना है, विचारात्मक रूप में — और उस हरकत को दार्शनिक सोच के अंतर्गत बूझना है। अवधारणा पर ध्यान देने का अर्थ है उस “अन्तर्निहित लय” — अर्थात् यथार्थ की जैविक अवधारणात्मक हरकत — में हस्तक्षेप न करना; कहीं और से कोई “बढ़िया विचार” लाकर उसमें न थोपना।
59. हेगेल तर्क-चातुर्य की उस मनोवृत्ति के दो पहलुओं पर विचार करते हैं जो अवधारणात्मक सोच के विपरीत हैं— एक इस पैराग्राफ में, और दूसरा अगले में। इन दोनों विचारात्मक प्रतिक्रियाओं के ज़रिए हेगेल तर्क-चातुर्य की मनोवृत्ति और विचारात्मक (अर्थात् अवधारणात्मक) मनोवृत्ति के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं।
तर्क-चातुर्य किसी विषयवस्तु के आलोचना के संदर्भ में पूरी तरह नकारात्मक होता है— वह खंडन करता है, विनाश करता है। “यह सही नहीं है” इसका अहम रवैया है— एक अंधी गली जो कहीं नहीं जाती। इसके बाद वह किसी नई चीज़ की तलाश में भटकता है जिससे अगली बहस शुरू की जा सके— यहां कोई निरन्तरता नहीं है। हेगेल का कहना है कि तर्क-चातुर्य की विषयवस्तु का अभिमान और खोखलापन, सिर्फ बंजर है। उसमें कोई सकारात्मक सुझाव नहीं है।
ध्यान देने लायक यह है कि हेगेल, जो अब तक नकारात्मकता को बहुत महत्व दे रहे थे, अब आगे चल कर नकारात्मकता को उसी पर लागू करते हैं — नकारात्मकता की सीमा खींचते हैं, और कहते हैं कि उसमें भी एक सकारात्मकता निहित है: यह दूसरी नकार है, पहली नकार की नकार, जो अब सकारात्मक हो जाती है।
क्योंकि तर्क-चातुर्य अपनी नकारात्मकता को विचारात्मक रूप से नहीं देख पाता है, वह विषयवस्तु के भीतर प्रवेश करके सत्य तक नहीं पहुँच सकता है। विषयवस्तु के महत्व को पूरी तरह से बातिल करके, और उसकी गहराई को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करते हुए, वह हमेशा उसकी सतह पर मंडराता रहता है। इसके विपरीत, अवधारणात्मक सोच को यह समझ है कि नकारात्मकता सिर्फ़ उसकी विशेषता नहीं है बल्कि विषयवस्तु की भी है। उसे यह बोध होता है कि विषयवस्तु के भीतर भी उसका प्रतिविरोध निहित है (देखिए पैराग्राफ 55 ) — अर्थात् विषयवस्तु के सकारात्मकता की संरचना में प्रतिविरोध निहित है: (क) इस अर्थ में कि वह भीतर से नकार द्वारा निर्धारित होती है (गुलाब एक फूल है, पत्थर नहीं, और न ही चम्पा है), और (ख) इस अर्थ में कि यह पूरी विचारात्मक हरकत अपने ‘प्राकृतिक’ अस्तित्व के विपरीत, नकारात्मक (स्व-परिवर्तनशील) है — यानी कि गुलाब को देखने वाला जब उसे पहचानता है, तो वह गुलाब को एक प्राकृतिक वस्तु से एक ऐसी वस्तु में बदल देता है जो वर्गीकरण योग्य, खेती-योग्य और परिवर्तनीय है। इस तरह, विचारात्मक या अवधारणात्मक सोच नकारात्मक को निर्धारित रूप में देखती है: इसका परिणाम अमूर्त संशयवाद (या तर्क-चातुर्य) नहीं होता जो अच्छे को भी बुरे के साथ फेंक देता है, बल्कि वह पुराने विकृत प्रतीति से मूल्यवान सत्य को छाँट कर उसका उदात्तीकरण करता है। इस तरह, यह एक सकारात्मक विषयवस्तु है।
60. तर्क-चातुर्य के पहले पक्ष अर्थात नकारात्मक पहलू (अमूर्त संशयवाद की प्रणाली)—का विचार पैराग्राफ 59 में कर लेने के बाद, अब हेगेल इस पैराग्राफ में तर्क-चातुर्य पर टिकी संज्ञान के सकारात्मक पहलू (यानी समझ) पर आते हैं। समझ की इस सकारात्मक दृष्टिकोण से सत्य-प्रत्यय की जैविक हरकत एक रुकावट-सी लगती है। पर यह “रुकावट” वास्तव में कुछ और नहीं, बल्कि समझ की अपनी ही स्थिर दृष्टिकोण का भीतर से घुलकर विचारात्मक युक्ति में समाहित हो जाना है, जहाँ उसे उसका सही दर्ज़ा मिलता है। यानी कि, जिसे समझ एक अड़चन की तरह महसूस करती है, वह असल में सत्य-प्रत्यय की स्वयं-विकसित होने वाली हरकत ही है, जो सोचने वाले के सामने अंततः विचारशील बूझ या युक्ति के रूप में प्रकट होती है।
नकारात्मक तर्क-चातुर्य में निर्णायक खुद सोचने वाला होता है और उसके बाहर कोई सत्य नहीं होता। इसके विपरीत सकारात्मक संज्ञान (समझ का सकारात्मक रूप) में ‘आत्म’ एक सुप्त व्यक्ति/कर्ता है जिसके लिए विषयवस्तु केवल एक विधेय या गुण/विशेषण है। यहाँ ‘आत्म’ विधेय का विशेष्य है। इस स्थिर विशेष्य पर विभिन्न विधेय के रूप में विषय-वस्तु जोड़े जाते हैं।
अवधारणात्मक सोच इससे अलग है। यहाँ अवधारणा (जो तर्क-वाक्य[6] में एक अलग प्रकार के विधेय के रूप में प्रकट होती है) व्यक्ति/कर्ता की अंदरूनी जैविकता है। इस लिए व्यक्ति/कर्ता जब अवधारणात्मक रूप से धरा जाता है, तो वह स्थिर विशेष्य नहीं रहता है; वह बनता है, अर्थात् अपनी ही अवधारणा की हरकत के रूप में प्रकट होता है।
यानी कि साधारण तर्क-वाक्य में समझ का विशेष्य केवल विधेय को ढोता है और खुद अपरिवर्तित रहता है; पर अवधारणात्मक तर्क-वाक्य में अवधारणा से निर्धारित व्यक्ति-कर्ता उन “विधेय” को आत्मसात कर लेता है—वह वही बन जाता है जो वे व्यक्त करते हैं। समझ का विशेष्य इस तरह उदात्तीकृत होकर अवधारणात्मक विचार का व्यक्ति-कर्ता के रूप में प्रकट होता है। अब वह अपने विषयवस्तु में प्रवेश करता है, विधेय के मुकाबले में एक “दूसरे” के तरह बाहर खड़ा नहीं रहता। इस तरह तर्क-चातुर्य का आधार—स्थिर कर्ता-कर्म विभाजन—ढह जाता है।
असल में (व्यक्ति)-कर्ता का वही हरकत है जिसके ज़रिए पहले अलग लगने वाला कर्ता अब अवधारणा में समाहित हो जाता है। वह अब बाहरी विधेय को ढोने वाला आधार मात्र नहीं रहता; उसकी “विषयवस्तु” अब उसकी आंतरिक अवधारणा बन जाती है।
समझ और चित्र-चिंतन के लिए यह काफी है कि वे विधेय के बेतरतीब गुणों के बीच घूमें। पर जब विषयवस्तु व्यक्ति-कर्ता का मूलतत्व हो, तब यह भटकाव रुक जाता है: निर्णयन[7] एक नई संपूर्णता की एकता में गुँथ जाता है। इसीलिए “गुलाब लाल है” समझ के दायरे में आता है। लेकिन “ईश्वर अस्तित्व है” अवधारणात्मक सोच का उदाहरण बनता है, जिसमें “अस्तित्व” कोई बाहरी विधेय नहीं, बल्कि विषय-वस्तु का ही सार है; इस कथन से हमारी ‘ईश्वर’ की अवधारणा ही रूपांतरित हो जाती है। “ईश्वर-अस्तित्व” एक नई इकाई बनाती है जो समझ के ऐसे तरीके को रोकती है जिसमें ईश्वर को एक स्वतंत्र सत्व के अमूर्त रूप में देखा जाता है।
समझ के सोचने के तरीके में, अगर “गुलाब” विशेष्य है और “लाल” विधेय है, तो कर्ता —अर्थात् निर्णय करने वाला मैं — विशेष्य और विधेय को अलग-अलग चिह्नित करता है; निर्धारण सोच की इस बाहरी निर्णयन-क्रिया का नतीजा है (कांट)। एक बार यह निर्णयन कर लेने के बाद मैं परे हटकर अपनी मर्ज़ी-माफ़िक दूसरे विधेय जोड़ सकता है। विधेयों के बीच का संबंध सतही रहता है, तर्कसंगत नहीं।
इसके विपरीत, अवधारणात्मक निर्णयन में – उदाहरणतः, “यथार्थता तर्क-संगति (ही) है”
– विधेय कोई बाहरी जोड़ नहीं, बल्कि वह सार है जिसके ज़रिए विशेष्य वही बन जाता है
जो वह है – यानी कि व्यक्ति-कर्ता। यहाँ कर्ता, ‘मैं’, अब विषयवस्तु के मुकाबले में एक
स्वतंत्र निर्णायक की स्थिति में नहीं रह सकता; उसे उसी परिवर्तन का अनुसरण करना पड़ता
है जो अवधारणात्मक सोच स्वयं उत्पन्न करती है।
अनुभवी व्यक्ति-कर्ता को समझ में आता है कि जिस विशेष्य को वह निर्धारित कर रहा था,
वह असल में विधेय की अंतर्निहित आत्मा है; मैं अवधारणा की हरकत में खिंच जाता है और अब
उसके बाहर नहीं रह सकता।
61. रूप के तहत कहें तो बात यह है: निर्णयन या तर्क-वाक्य (चाहे वह समझ की हो या सामान्यतः तर्क-चातुर्य की चिंतन की) में विशेष्य और विधेय के बीच एक भेद होता है। इस भेद को ‘है’ (is) नामक संयोजक द्वारा चिह्नित किया जाता है। जब यह तर्क-वाक्य की संरचना विचारात्मक चिंतन से नियंत्रित होती है, तो साधारण तर्क-वाक्य एक तादात्म्यात्मक तर्क-वाक्य बन जाता है। यानी कि जहाँ सामान्य स्थिति में विधेय एक अमूर्त कोटि प्रदान करता है, जिसमें विशेष्य का विश्लेषण किया जाता है (जैसे— गुलाब लाल है), वहीं विचारात्मक तर्क-वाक्य में विशेष्य और विधेय के बीच एक आंशिक तादात्म्य स्थापित हो जाता है (जैसे— ईश्वर अस्तित्व है)। यहाँ ‘अस्तित्व’ कोई ऐसा विधेय नहीं है जिसे अमूर्त रूप से ईश्वर पर आरोपित किया जा सके; बल्कि वह एक आंतरिक, निर्णायक गुण है, जो अवधारणात्मक अंतरव्यापन के ज़रिए ईश्वर और अस्तित्व— दोनों का रूपांतरण करता है। यह तादात्म्य बनना साधारण तर्क-वाक्य की संरचना के खिलाफ़ एक प्रतिरोध है। यह बनना चिंतन को विश्लेषणात्मक चिंतन और संशयवाद से आगे जाने के लिए बाध्य करता है।
यह अंतर-विरोध साधारण तर्क-वाक्य की संरचना को पूरी तरह से उखाड़ता नहीं है। साधारण तर्क-वाक्य की संरचना उस संगीतिक लहज़े (accent) के समान है, जो द्रव्यात्मक जीवन के शांत छंद (metre) को झटका देता है। अगर ऐसा है, तो दार्शनिक तर्क-वाक्य (जो विचारात्मक/तादात्म्य-प्रेरित है) वह समन्वयात्मक एकीकरण है, जो उस लहज़े के अलग-खड़े होने का (यानी कि स्वयं-के-लिए-होने वाले व्यक्ति-कर्ता, जो दुनिया से अलग खड़े होकर उसका निर्णयन करता है, उसका) उदात्तीकरण करती है। यह उदात्तीकरण असल में लहजा (स्वयं-के-लिए होना) और छंद (स्वयं-में-होना) एकत्रित होकर लय (rhythm) में परिणत होते हैं। यह स्वयं-में-और-स्वयं-के-लिए-होने की उभरती संरचना है। और ज़्यादा सही रूप से कहें तो यह वह दार्शनिक एकता है, जो चित्त की लय का अनुसरण करती है— जब चित्त अपने जैविक चरणों में (उस लड़खड़ाती, छंद-विचलित बखनाली उन्मत्तता में) व्यक्ति-कर्ता के उभरने वाली सत्तामूलक रूपों के ज़रिए आगे बढ़ती है।
62. जब हम कहते हैं “ईश्वर है सत्” (God is Being), तो तर्क-वाक्य की संरचना के अनुसार सत् से यह अपेक्षा होती है कि वह ईश्वर का कोई विधेय या लक्षण हो। पर वास्तव में यहाँ सत् स्वयं में ही एक द्रव्य[8] है। ध्यान रहे कि हम यह नहीं कह रहे कि ईश्वर एक सत् है। हम यह कह रहे हैं कि ईश्वर और सत् की तादात्म्यता है—यानी यह वही है जिसे हेगेल ने पैराग्राफ 61 में तादात्म्यात्मक तर्क-वाक्य कहा है।
“सत् द्रव्य है” का अर्थ क्या है? इसका अर्थ यह नहीं है कि सत् कोई बेतरतीब गुण या ऐसा
लक्षण मात्र है जिसके ज़रिए दूसरे द्रव्य (यहाँ ईश्वर) की स्पष्टीकरण की जा सके। सत् स्वयं
में द्रव्य है—उसमें अवधारणात्मक भार है, जिसे समझने और जाँचने की आवश्यकता है।
जब हम कहते हैं ईश्वर है सत्, तो हम यह कह रहे होते हैं कि ईश्वर का सार ही सत् है।
अब तर्क-वाक्य का विशेष्य, ईश्वर, घुलकर अपने ही “विधेय”, सत्, में समा जाता है।
अब तक जिस तर्क-चातुर्य चिंतन की हमें समझ रही है, उसमें तर्क-वाक्य का विशेष्य एक स्थिर
खूंटी की तरह होता है, जिस पर हम गुणों और लक्षणों को टाँगते हैं। लेकिन इस तादात्म्यात्मक
तर्क-वाक्य में यह स्थिर खूंटी ही “विधेय”, यानी कि सत्, में घुल मिल जाता है।
यहाँ वह दूसरा विशेष्य (अर्थात् सोचने वाला व्यक्ति-कर्ता, जिसकी चर्चा हम पैराग्राफ 60
से करते आ रहे हैं) दबाव महसूस करता है, क्योंकि विशेष्य अब वह स्थिर, अपरिवर्तनीय खूंटी
नहीं रह गई जिस की उसे अपेक्षा थी। इस वजह से चिंतन को विशेष्य के साथ ही टिके रहना
पड़ता है, यह समझने की कोशिश करते हुए कि वह वास्तव में है क्या।
या फिर, चूँकि सत् विशेष्य (ईश्वर) का सार व्यक्त करता है, चिंतन स्वयं को विधेय में भी
फँसा हुआ पाता है, अब ऐसा लगता है कि मानो विधेय विशेष्य को अपने अंदर समेटे हुए हो। और
एक बार विधेय में प्रवेश कर लेने के बाद (या विशेष्य की इस उलझन में ठहरे रहने के कारण),
चिंतन अब अपने में वापस लौटकर आत्मविश्वास से सत्य पर निर्णय दे नहीं पाता । उसे
तादात्म्यात्मक तर्क-वाक्य में समाहित रहते हुए चिंतन करना पड़ता है।
इसी तरह, जब तादात्म्यात्मक तर्क-वाक्य का रूप होता है—वास्तव सार्वभौम है (न कि “वास्तव सार्वभौमिक है”)—तो सार्वभौम अब कोई विधेय या बेतरतीब गुण नहीं रहता। वह वास्तव का सार व्यक्त करता है। इसका मतलब यह है कि वास्तव, जिसमें वस्तुगत अस्तित्व का आयाम है, वही सार्वभौम है, जिसमें व्यक्तिपरक चिंतन का आयाम होता है। यानी कि सोच (या युक्ति) अब सिर्फ व्यक्तिपरक दायरे तक सीमित नहीं रहती; वह वास्तविकता का भी एक घटक बन जाती है। सतही तौर पर विरोधाभास जैसी लगने वाले बातों के बीच एक अभिन्नता का आभास होता है; यह इस दूसरे विशेष्य, अर्थात् इन तर्क-वाक्यों को रचने वाले चिंतक या व्यक्ति-कर्ता को, तर्क-वितर्क की कसरत और आत्म-विश्वस्त घोषणाओं से विरत होने को बाध्य करती है। उसे विनम्रता के साथ कही जा रही बात के भार के आगे झुकना पड़ता है, और उसके साथ ठहरकर उसका अर्थ समझने की कोशिश करनी पड़ती है । यही दर्शन का सच्चा और अकेला धेय है: सोच की उस हरकत का अनुसरण करना, जिसके ज़रिए वह अपने विकसित होने वाली प्रक्रिया में अंतर्दृष्टि खोजती है।
ध्यान रहे कि दूसरा तर्क-वाक्य—वास्तव सार्वभौम है—हेगेल की अपनी है; जबकि पहला —ईश्वर है सत्—अक्विनास ने रखी थी, जो ऑगस्टीन, इब्न सीना और ऐन्सेल्म जैसे पूर्ववर्ती दार्शनिकों के लेखों पर आधारित थी, और उन सब से पहले अरस्तू पर। हेगेल यह स्वीकार करते हैं कि यह एक विचारात्मक तर्क-वाक्य है; पर अपने स्वयं के दर्शन में वे ईश्वर की धारणा को प्रथम सत् या प्रधान प्रेरक तक सीमित नहीं रखते हैं (जैसा कि अक्विनास, ऐन्सेल्म और ऑगस्टीन में मिलता है)। वे अरस्तू की ईश्वर-धारणा को (जहाँ ईश्वर अंतिम कारण [final cause] है , जिसे सोच खोजती है) ऐसे स्वयं को खोजने वाली धारणा में बदल देते हैं, जिसमें पूर्णता विचार से हासिल होती है।
63. अगर पैराग्राफ 60–62 समझने में ऐसे मुश्किलात आते हों कि मायूसी और नाकामी पैदा हो जाए, तो यह पैराग्राफ एक “मेहरबान सख्ती” पेश करता है।
हम दार्शनिक लेखन के आदी नहीं हैं और अक्सर शिकायत करते हैं कि उन्हें समझने के लिए बार-बार पढ़ना पड़ता है; यह कठिनाई, “सांस्कृतिक शर्तों” (टिप्पणी: शिक्षा, बौद्धिक परिपक्वता, समय, योग्यता — इन सबको हम आज की समतावादी सोच में दांभिकता कहकर खारिज कर देते हैं) को पूरा करने के बावजूद महसूस होता है। दर्शन की कठिनता के खिलाफ आरोप इतना तीखा हो जाता है कि मानो उसका कोई जवाब ही न हो।
लेकिन 60–62 हमें बताते हैं कि ऐसा क्यों होता है (बशर्ते हमने मेहनत से उनकी बड़ी कठिनाई से जूझा हो)। क्योंकि विचारात्मक तर्क-वाक्य भी एक तर्क-वाक्य है, हम यह मान लेते हैं कि वह एक सामान्य तर्क-वाक्य की तरह समझा जाए — यानी कि एक ऐसा सम्बन्ध, जिसमें विशेष्य एक स्थिर आधार हो और विधेय उस पर बेतरतीब गुण जोड़ दे।
पर दार्शनिक तर्क-वाक्य हमें रोकती है, ठहरने पर मजबूर करती है, और इस सवाल के साथ बने रहने को कहती है कि यह “विशेष्य” और “विधेय” आपस में कैसे जुड़े हैं। यह सम्बन्ध तर्क-चातुर्यपूर्ण वाक्य की संरचना से अलग होता है। तर्क-वाक्य पर इस तरह विचार करने के अनुभव से हमें समझ में आता है कि हमारा मत ठीक नहीं था, और तर्क-वाक्य के प्रति हमारा पुराना रवैया गायब हो जाता है। यह अनुभव हमारे ज्ञान-संरचना के ज्ञान को बाध्य करता है कि वह लौटकर किसी दूसरे दृष्टिकोण से उसी तर्क-वाक्य का पुनः विचार करे।
जब हम विचारात्मक और तर्क-चातुर्य पूर्ण तर्क-वाक्यों के तरीकों को मिला देते हैं, तब एक मुश्किल पैदा होती है। तर्क-चातुर्य पूर्ण तर्क-वाक्यों में विधेय सिर्फ विशेष्य के खूंटी पर बेतरतीब गुण टांग देते हैं। लेकिन विचारात्मक तर्क-वाक्य में विशेष्य-विधेय सम्बन्ध एक अवधारणा का रूप ले लेता है, जहाँ दो विशेष्य के रूपों के बीच तार्किक संरचना और आपसी सम्बन्ध स्थापित होते हैं। जब ये दोनों तरीके मिल जाते हैं, तो दूसरा (तर्क-चातुर्य पूर्ण तरीका) पहले में दखल देता है। सिर्फ ऐसी दार्शनिक व्याख्या जो इस मिश्रण को रोकती है, वही ढलने/ढालने की शक्ति (plasticity) हासिल कर सकती है।
अब ढलने/ढालने की शक्ति का अर्थ क्या है? इसका मतलब है वह प्रक्रिया जिसमें किसी तर्क-वाक्य का विशेष्य एक स्थिर आधार या केवल गुणों को टाँगने वाली खूंटी नहीं रहता। वह अपना आकार और संरचना बदलकर एक विकसित रूप में ढलता है। ढलने/ढालने की शक्ति का मतलब है मूलतत्व को रूप देना; और स्पष्ट रूप से कहा जाए तो यह दार्शनिक चिंतन है जो मूलतत्व के व्यक्ति-कर्ता बनना या उसके स्व-गठन को अनुसरण/बूझ/आत्मसात करता है।
64. जब हम विचारात्मक और तर्क-चातुर्य पूर्ण तर्क-वाक्यों के तरीकों को मिला देते हैं, तब एक मुश्किल पैदा होती है। तर्क-चातुर्य पूर्ण तर्क-वाक्यों में विधेय सिर्फ विशेष्य के खूंटी पर बेतरतीब गुण टांग देते हैं। लेकिन विचारात्मक तर्क-वाक्य में विशेष्य-विधेय सम्बन्ध एक अवधारणा का रूप ले लेता है, जहाँ दो विशेष्य के रूपों के बीच तार्किक संरचना और आपसी सम्बन्ध स्थापित होते हैं। जब ये दोनों तरीके मिल जाते हैं, तो दूसरा (तर्क-चातुर्य पूर्ण तरीका) पहले में दखल देता है। सिर्फ ऐसी दार्शनिक व्याख्या जो इस मिश्रण को रोकती है, वही ढलने/ढालने की शक्ति (plasticity) हासिल कर सकती है।
अब ढलने/ढालने की शक्ति का अर्थ क्या है? इसका मतलब है वह प्रक्रिया जिसमें किसी तर्क-वाक्य का विशेष्य एक स्थिर आधार या केवल गुणों को टाँगने वाली खूंटी नहीं रहता। वह अपना आकार और संरचना बदलकर एक विकसित रूप में ढलता है। ढलने/ढालने की शक्ति का मतलब है मूलतत्व को रूप देना; और स्पष्ट रूप से कहा जाए तो यह दार्शनिक चिंतन है जो मूलतत्व के व्यक्ति-कर्ता बनना या उसके स्व-गठन को अनुसरण/बूझ/आत्मसात करता है।
65. अ-विचारात्मक चिंतन की अपनी जगह और वैधता है, पर विचारात्मक चिंतन को उससे आगे बढ़ना चाहिए। तर्क-चातुर्यपूर्ण तर्क-वाक्य का रूप विशेष्य–विधेय होता है, जहाँ विशेष्य एक अपरिवर्तनीय आधार है, और विधेय उसमें ऐसे बेतरतीब गुण जोड़ता है जो तार्किक रूप से उससे जुड़े हुए नहीं होते। विचारात्मक चिंतन में यह रूप उदात्तीकरण से बदल जाता है और एक तादात्म्यात्मक तर्क-वाक्य बन जाता है (देखें पैराग्राफ 61)।
लेकिन (और यहीं हेगेल यकोबी और शेलिंग दोनों की आलोचना करते हैं) इस उदात्तीकरण को सिर्फ अंतर्ज्ञान, एकाएक अंतर्दृष्टि, या किसी अमध्यस्थ अनुभव के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। तर्क-वाक्य के इस उदात्तीकरण की प्रक्रिया को विचारात्मक प्रस्तुतीकरण में दिखाया जाना चाहिए। इस उदात्तीकरण की प्रक्रिया, अर्थात् द्वंद्वात्मक हरकत, को विचारात्मक प्रस्तुति में स्पष्ट रूप से सामने लाया जाना चाहिए।
अन्तर्दृष्टिवादी दर्शन में यह हरकत सिर्फ निहित रहता है; उसे तर्क-वाक्य में एक मौजूदगी के रूप में स्पष्ट नहीं किया जाता। अंतर्दृष्टि या अंतर्ज्ञान का ऐसे आह्वान से विचारात्मक चिंतन की यह हरकत रोक दी जाती है। तर्क-वाक्य में यह अपेक्षा रहती है कि सत्य एक स्थिर विशेष्य और उसके विधेय के बीच का संबंध है। लेकिन वास्तव में होता यह है कि विशेष्य जो तर्क-वाक्य में अपरिवर्तनीय आधार था, वह अब एक गतिशील विचारात्मक व्यक्ति-कर्ता बन जाता है। वह अपने ही अपरिवर्तनीय स्वरूप को नकारता है, अपने-आप से बाहर “दूसरे” में (अर्थात् विधेय में) जाता है, और इस प्रक्रिया में खुद को बदलते हुए अपने-आप में लौट आता है। दर्शन की दूसरी, पुरानी परंपरा में—जिसे प्रबोधन-युग और उसके बाद के दार्शनिक चिंतन ने खारिज कर दिया—विशेष्य का यह “द्वंद्वात्मक” हरकत मौजूद था, हालांकि एक अधूरे रूप में। लेकिन प्रबोधन-युग ने द्वंद्वात्मकता को प्रमाण से अलग करके उसे खारिज कर दिया। फलस्वरूप, दर्शन में विचारात्मक प्रदर्शन जो तब तक भला अपूर्ण रूप में ही था, खो गया.
66. पैराग्राफ 65 में हेगेल ने दार्शनिक प्रतिपादन के द्वंद्वात्मक हरकत के साथ बने रहने के महत्व पर ज़ोर दिया था, और यह भी बताया था कि जब द्वंद्वात्मकता को प्रमाण से अलग करके गलतियों के दायरे में भेज दिया जाता है (विशेषतः इमैनुएल कान्ट के ट्रान्सेन्डेंटल डायलेक्टिक में), तब ऐसा करना कितना मुश्किल हो जाता है।
इस पैराग्राफ में वह इसी कठिनाई की जाँच करते हैं। तर्क-वाक्य द्वंद्वात्मक हरकत के अंग होते हैं; इस लिए ऐतिहासिक संदर्भ में समस्या यह उठती है कि दार्शनिक प्रतिपादन को तर्क-वाक्यों के ज़रिए से ही आगे बढ़ना होता है। जब हम तर्क-वाक्यों का उपयोग करते हैं, तब हम बाह्य प्रमाण से आगे कैसे बढ़ें? यह किसी भी प्रमाण में आधार-कारण[9] की समस्या के समान है—हर आधार-कारण को अनंत क्रम में किसी और आधार-कारण पर टिकना पड़ता है। जिस तरह सामान्य प्रमाण आधार-कारण की इस अनंत क्रम से छुटकारा नहीं पा सकता, उसी तरह विचारात्मक प्रतिपादन भी तर्क-वाक्यों द्वारा आगे बढ़ने से मानो छुटकारा नहीं पा सकता।
बहर हाल आधार-कारण की खोज, और सामान्यतः प्रमाण, बाहरी संज्ञान में पैदा होते हैं—यानी कि जब चिंतक बाहरी तौर से व्यक्ति के रूप में वस्तु से अलग होता है। इसके विपरीत, द्वंद्वात्मक हरकत का माध्यम शुद्ध अवधारणा है, जो पूरी तरह से स्व-चालित व्यक्ति/कर्ता है। विचारात्मक तर्क-वाक्य में कोई स्थिर, अपरिवर्तनीय विशेष्य नहीं होता जिस पर कोई विधेय आरोपित किया जाए। विचारात्मक सोच में, तर्क-वाक्य में विशेष्य-विधेय की संरचना मिटा दिया जाता है; वह एक खोखला रूप बन जाता है। दूसरे (काफ़ी बाद के) शब्दों में, विचारात्मक सोच की हरकत तर्क-चातुर्य पूर्ण तर्क-वाक्य की विसंरचना[10] कर देती है।
एक तरफ विशेष्य इंद्रियों में मौजूद रहता है; दूसरी तरफ विशेष्य सोच में मौजूद रहता है; इन दोनों के विपरीत निरा विशेष्य एक नाम मात्र है। वह एक अवधारणा-पूर्ण एक है—जैसे “मैं” या “सत्ता”—जो किसी ऐंद्रिय या पूर्वधारणाओं का बोझ नहीं ढोता। इसी लिए दर्शन में पूर्वधारणाओं के बोझ से बचने के लिए, हेगेल यह सुझाव देते हैं कि “ईश्वर” जैसे नाम/विशेष्य से बचना उपयोगी होगा, क्योंकि यह कोई अवधारणा की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि एक “सच्चा” (यानी कि साधारण वास्तविक) नाम माना जाता है जो एक अपरिवर्तनीय द्रव्य की ओर इशारा करता है। इसके विपरीत, सत्ता या एक शुद्ध अवधारणाओं की ओर इशारा करते हैं।
समस्या यह है कि अगर “ईश्वर” नामक विशेष्य से विचारात्मक सत्यों को, विधेयों के रूप में जोड़े भी जाएं, तो भी चूंकि यह नाम एक स्थिर विशेष्य का प्रतिनिधित्व करता है, ये विधेयात्मक सत्य अलंकार जैसे विधेय मात्र बन जाते हैं—यानी कि वे उस स्थिर ईश्वर नामक विशेष्य के अलंकरण बन जाते हैं। इस तरह, अगर ईश्वर नामक विशेष्य पूर्वधारणाओं से लदा हुआ है, तो विधेय पक्ष में भी एक निश्चित गुण का भ्रम पैदा होता है, जिसमें अवधारणा या सार हो जाते हैं। अहम बात यह है कि जब दार्शनिक प्रतिपादन असली मुद्दे को स्पष्ट रूप से नहीं व्यक्त करता है, तब पाठक फिर से तर्क-चातुर्यपूर्ण सोच की ओर लौटने पर मजबूर हो सकता है।
इस लिए दार्शनिक प्रतिपादन को विचारात्मकता पर टीके रहना चाहिए, द्वंद्वात्मक रूप को बनाए रखना चाहिए, और अन्य सभी रूपों से बचना चाहिए।
67. अब तक हेगेल ने दिखाया है कि यथार्थ विचारात्मक फलसफा की खोज में तर्क-चातुर्यपूर्ण सोच किस तरह मुश्किलें पैदा करती है। यहाँ वे उस जिद्दी अमध्यस्थ रवैये की आलोचना करते हैं जो जड़ीभूत निश्चितताओं का दावा करता है। इस तरह की विचारहीनता का प्रवक्ता कभी इन निश्चितताओं को फिर से जाँचने के लिए लौटता नहीं है; बल्कि इन्हीं के आधार पर किसी विषय पर तर्क-वितर्क और निर्णयन करता है।
फलसफे को एक गंभीर प्रयास मानना चाहिए। दूसरे सभी क्षेत्रों—विज्ञान, कला, कौशल, शिल्प—में यह स्वीकार किया जाता है कि अनुशीलन और अभ्यास ज़रूरी हैं। लेकिन दार्शनिक चिंतन को अक्सर इस तरह लिया जाता है मानो वह स्वतः स्फूर्त हो, जैसे कि साधारण ज्ञान ही उसे ज़रूरी साधन देता हो; जबकि हाथ, आँख और उँगलियाँ मात्र होने से कोई मोची नहीं बन जाता। वाकई, अगर साधारण ज्ञान ही वह मापदण्ड है जो किसी को भी दार्शनिक बनाता है, तो फिर पाँव वह मापदण्ड क्यों नहीं है जो सभी को जूते बनाने लायक बना दे?
आगे बढ़ते हुए, हेगेल को यह अजीब लगता है कि दर्शन में दक्षता ज्ञान, सूचना और प्रशिक्षण के अभाव पर निर्भर करता है। इसे अक्सर ऐसे रूपात्मक ज्ञान जैसे देखा जाता है जिसमें कोई विषयवस्तु नहीं होती। यहाँ जो मुख्य बात छूट जाती है, वह यह है कि कोई भी विज्ञान या ज्ञान क्षेत्र तभी ऐसा कहलाने लायक होगा जब वह दर्शन से उभरा हुआ हो। अन्यथा, उनमें जितना भी तर्क-वितर्क किया जाए—अगर उनका विचारात्मक आधार नहीं हो—तो जीवन, चित्त, या सत्य तक नहीं पहुँच सकते।
68. सच्चे दर्शन के लिए गहरी और विस्तृत शिक्षा की ज़रूरत है, जिसके ज़रिए चित्त ज्ञान तक पहुँचता है। “चित्त का ज्ञान तक पहुँचना” का आशय उस प्रक्रिया से है जिसका वृत्तान्त चित्त का परिघटनाशास्त्र में मिलता है—जहाँ चित्त अपनी आगे की यात्रा में बाकायदा परम ज्ञान तक ले जाई जाती है। यही चिंतन की मेहनत ज़रूरी है।
इसके विपरीत, ठोस सामान्य ज्ञान —जिसने न कभी कोई मेहनत की है, न दर्शन सीखा है, न ही किसी दूसरी तरह का ज्ञान अर्जित किया है—अपने को इस यात्रा के काबिल मान लेती है। यह वैसा ही है जैसे यह कहना कि चिकोरी और कॉफ़ी बराबर हैं। वास्तव में यह एक भद्दा नज़ारा है कि अज्ञानता और स्थूलता—जिसमें न रूप है, न रुचि, और जो एक भी कथन पर ध्यान नहीं लगा सकता है, अनेक कथनों के संबंधों की तो बात ही छोड़ दें—अपने को “आज़ाद” और यहाँ तक कि “प्रतिभा” मानता है।
और यहाँ हेगेल सीधे ही शेलिंग पर निशाना साधते हैं: उनके परम के प्रति प्रस्तावित दृष्टिकोण को “प्रतिभा की छलाँग” कहकर मज़ाक उड़ाते हैं। “प्रतिभा” खराब कविता और उससे भी खराब दर्शन पैदा करती है —और बेतरतीब भाषण भी। ऐसी प्रतिभा अपने को अवधारणात्मक चिंतन से ऊपर समझती है, और सिर्फ अंतर्दृष्टि पर निर्भर करती है, वह विचारों की भद्दी खिचड़ी बना देती है—जो न तो काव्य होता है, न ही दर्शन।
69. हेगेल इस धारणा को परखते हैं कि सामान्य ज्ञान दार्शनिक चिंतन तक पहुँचने का एक कथित रास्ता है।
पैराग्राफ 68 में वे सामान्य ज्ञान को अमध्यस्थ चिंतन के रूप में उल्लेख कर चुके हैं, जिसका निकृष्ट अवतार है मत यानी कि, तुरंत अनुभूत सत्य का हठधर्मी दावा। सामान्य ज्ञान का एक खास भाई है प्रतिभा, जिसकी पैराग्राफ 68 में विस्तार से चर्चा की गयी है। अमध्यस्थता के ये रूप तर्क चातुर्य के विपरीत हैं। लेकिन यह विरोध निष्फल है, क्योंकि बहस बिना किसी समाधान के दोनों पक्ष के बीच डोलता रहता है। अगर ज़्यादा तर्क वितर्क होने लगे, तो सामान्य ज्ञान की ओर लौटने की मांग उठती है। और अगर सामान्य ज्ञान पर ज़्यादा जोर दिया जाए, तो फिर तर्क की ओर लौटने की माँग होती है। अगर सामान्य ज्ञान मध्यस्थता को नकारता है तो तर्क वितर्क ज़्यादा ही बाह्य मध्यस्थता पर ज़ोर देता है। ये दोनों ही अवधारणा के विपरीत हैं, जो हेगेल के दृष्टिकोण से सही मध्यस्थता का खरा मापदंड है (यहाँ हम सिर्फ इतना इशारा ही कर सकते हैं कि अवधारणा उस विचार के अंदरूनी तर्क की हरकत है जिसको जांचा जा रहा है)।
पैराग्राफ 69 में हेगेल स्पष्ट करते हैं कि उनका लक्ष्य सामान्य ज्ञान का दार्शनिक आंदोलन है (हैरिस और इनवुड यहाँ थॉमस रीड, जेम्स बीटी, जेम्स ऑस्वाल्ड, विल्हेल्म ट्राउगॉट क्रुग आदि का उल्लेख करते हैं), जो यह दावा करता है कि दार्शनिक ज्ञान सामान्य ज्ञान को उलट-पुलट नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, दर्शन अंतर्दृष्टि-विरोधी नहीं हो सकता। इस पैराग्राफ में हेगेल उनके दृष्टिकोण को उसकी चरम परिणति तक ले जाते हैं (जो वास्तव में उनके तर्क की एक सम्भावित परिणति भी है) कि दर्शन को सामान्य ज्ञान के बराबर होना चाहिए। इसी परिप्रेक्ष्य से हेगेल सामान्य ज्ञान के विरुद्ध अपना तर्क रखते हैं (लेकिन उनके अपने दृष्टिकोण पर हम इस टिप्पणी में थोड़ी देर बाद लौटेंगे)।
इस तरह इतना ऊंचा दर्ज़ा दिया गया सामान्य ज्ञान सिर्फ घिसी-पिटी सच्चाइयों की बयानबाज़ी के अलावा और कुछ नहीं है — और अगर इस पर यह आपत्ति की जाए कि ये बातें घिसी-पिटी हैं, तो वह इस बात का सहारा लेता है कि ये सच्चाइयां दिल में बसे हैं, और इसलिए यह मान लेना चाहिए कि सबके ये दिल में मौजूद हैं। सामान्य ज्ञान के दार्शनिकों के लिए, विशेषकर बीटी, ऑस्वाल्ड और क्रुग के लिए, जो कुछ पाक और साफ दिल में बसता है, उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। ऐसा मानना कहावतों और नीरा आस्था-आधारित बाइबिलीय ज्ञान की प्रश्नोत्तरी-परंपरा (कैटेकिसम) से जुड़ जाता है। लेकिन हेगेल का आग्रह यह है कि अचिंतित [11] की धुँधली गुफा में ज्ञात इन सच्चाईयों को प्रकाश में लाया जाना चाहिए [यहाँ प्लेटो की गुफा-रूपक की गूंज सुनाई देती है]।
ऐसी सच्चाइयां अस्थिर और विकृत होते हैं — क्योंकि ऐसा दिखाया जा सकता है कि इस स्तर पर एक ही आत्म-चेतना परस्पर-विरोधी सत्यों का समान रूप से दावा कर सकती है। अपने ही उलझन में फँस जाने पर ऐसा सामान्य ज्ञान हठधर्मी बन जाता है और यह दावा करने लगता है कि बाकी सब कुतर्क है (ऑस्वाल्ड और क्रुग)।
चूँकि सामान्य ज्ञान सच्चाई की एक आंतरिक अनुभूति है, इसलिए वह दूसरे मत को सहन नहीं करता। या फिर वह समाज के साझेपन को पैरों तले रौंद देता है, जो मानवता की जड़ है। साझा करना, समझाना और सहमति तक पहुँचना मानवीय है; सिर्फ अनुभूतियों का आग्रह करना और अचिंतित संवेदन तक सीमित रहना पशुत्व के स्तर पर ठहर जाना है।
हेगेल सामान्य ज्ञान के विरोधी नहीं हैं। बल्कि उनके लिए सामान्य ज्ञान की अमध्यस्थता मध्यस्थताओं की एक पूरी संरचना पर टिकी होती है, जिसे खोद कर स्पष्ट किया जाना चाहिए।
70. ठोस सामान्य ज्ञान तर्क-विज्ञान तक पहुँचने का सबसे आसान रास्ता लगता है—एक राजमार्ग; यानी कि ऐसा रास्ता जो उबड़-खाबड़ न हो, जिसमें ना गड्ढे, न किसी तरह की तकलीफ हो। यह तरीका (या सामान्य ज्ञान का रास्ता) समीक्षाओं, भूमिकाओं और शुरू के कुछ पैराग्राफ के पढ़ने से पुख्ता होता हुआ लगता है। भूमिकाएं और शुरू के पैराग्राफ प्रस्तुत सिद्धान्तों का वर्णन करते हैं, जबकि समीक्षाएँ एक ऐतिहासिक दृष्टि से उनका मूल्यांकन प्रस्तुत करती हैं; और यह मूल्यांकन, चूँकि वह आकलन है, उस दार्शनिक कृति जिसका वह परीक्षण कर रहा है उसके सतह पर मंडराता है। यह दर्शन के प्रति एक तरह का आसान या लापरवाह रवैया है—मानो एक “कैज़ुअल फ़्राइडे” शैली। इसका जुड़वाँ रूप है उदात्त प्रतिभा का चोग़ा, जो दर्शन तक मेहनत से पहुँचने के बजाय अपने को पहले से ही उसके केन्द्र में स्थित मानता है। ऐसा ‘गांभीर्य’ सत्य के स्रोत को प्रकट नहीं करती, और प्रतिभा की ये चमकदार झलकियाँ किसी स्वर्ग के तरफ संकेत नहीं करतीं। सिर्फ अवधारणा की मेहनत ही हमें सत्य का बोध करा सकती है और वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकती है। यही मेहनत एक ऐसा सार्वभौमिक ज्ञान दे सकती है जो न तो सामान्य ज्ञान की अस्पष्टता और खोखलापन हो, और न ही वह विकृत विचार जो प्रतिभा की सुस्ती और अहंकार से पैदा होता है। सिर्फ अवधारणा ही उस सत्य को उभार सकती है जो सचमुच परिपक्व हो, और जो समूचे चेतनापूर्ण सोच की साझा संपत्ति बन सके।
71. विज्ञान की हरकत अवधारणा की स्वचालित-हरकत के ज़रिए बनती है। दूसरे शब्दों में, यथार्थता में अवधारणा की अपनी हरकत के अनुसार, विज्ञान सोच के अपने उदात्तीकरण और शुद्धिकरण से पैदा होता है। लेकिन हेगेल देखते हैं कि उनके ज़माने में (वह ज़माना जो समझ, आस्था, मत, अमध्यस्थ अंतर्ज्ञान, सामान्य ज्ञान, प्रतिभा आदि से संचालित है) सत्य की प्रकृति के बारे में प्रचलित धारणाएँ उनके दृष्टिकोण के विपरीत हैं। इसलिए उनके दार्शनिक दृष्टिकोण की अनुकूल स्वीकृति की संभावना कम दिखाई देती है। फिर भी, इतिहास में ऐसे अवसर आए हैं जब प्लेटो की महानता को उनकी मिथकीय रचनाओं में देखा गया, और साथ ही साथ एरिस्टॉटल के महान दर्शन को उसकी विचारात्मक गहनता के कारण मान्यता मिली। प्लेटो के परमेनिडीस को भी, उनके मिथकों के अलावा, उसकी अनोखी महानता के लिए सराहा गया। यह सब उसी समय हुआ जब रहस्यपूर्ण परमानंद[12] के दृष्टिकोण का प्रभाव व्यापक था, और उसी को ‘रहस्यपूर्ण’ (समझातीत) ढंग से शुद्ध अवधारणा के रूप में देखा जाता था। यानी कि त्रुटि और भ्रम के कोहरे में सत्य को पहचाना गया।[13] दूसरी विचारधाराओं के अस्वीकार करने के बावजूद हेगेल के ज़माने में दर्शन का मूल्य उसके वैज्ञानिक प्रकृति में पहचाना गया। हेगेल इन ऐतिहासिक प्रवृत्तियों को देखते हैं और आशा करते हैं कि वह समय भी आएगा जब उनका विज्ञान मूल विषय के सत्य के रूप में स्वीकार किया जाएगा। ऐसे विश्वास को बनाए रखने की हिम्मत ज़रूरी है कि ठीक समय पर सत्य सामने आएगा—न उससे पहले, न अधपके रूप में, और तभी जब जनता उसे अपनाने लायक हो जाए। दर्शन पर विचार करने वाले हर इंसान को ऐसा विश्वास होना चाहिए कि उसकी खास सोच, जो पहली नजर में सिर्फ अकेले उसी की है, वास्तव में एक सार्वभौमिक सत्य को व्यक्त करेगा। लेकिन जनता (जो देर-सबेर समझ तक पहुँच ही जाती है) और उसके प्रतिनिधियों के बीच भेद करना चाहिए: तुच्छ बुद्धिजीवी, आलोचक, और सीमित दृष्टि वाले दार्शनिक। जनता अक्सर उदार मन से यह मान लेती है कि किसी मुश्किल लेख को न समझ पाने में कमी उसकी अपनी भी हो सकती है; जबकि ये प्रतिनिधि तुरंत लेखक पर दोष डाल देते हैं, लेकिन जनता पर उनका असर नहीं पड़ता। आजकल सब कुछ बहुत तेज़ चल रहा है; ज़िंदगी ज़्यादा ही जटिल और सजग हो गयी है; निर्णय बहुत जल्दी ही किए जाते हैं। इसलिए जो लोग आपको निकाल देना चाहते हैं, वे मानो पहले से ही दरवाज़े पर खड़े हैं। लेकिन हमें उस धीमे, गहरे बदलाव की धारा को भी पहचानना चाहिए जो इस जल्दबाज़ी में की गई निंदा और फटकार को आखिर सुधार देती है। वही धारा भविष्य में सत्य के असली परिवर्तक के लिए जगह बनाती है, जबकि जो लोग आज निर्णायक सत्ता रखते दिखाई देते हैं, वे कल भूला दिए जाएंगे।
72. हेगेल के ज़माने में सार्वभौमिकता (यानी कि दुनिया की वह ठोस एकता जिसमें उसके सभी पक्ष एक-दूसरे से जुड़े हुए एक जैविक समग्र हैं) काफी ज़्यादा पेचीदा हो चुकी थी, जबकि एकलता (या चित्त की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति) का महत्व घट गया था। इसका प्रभाव ज्ञान की बढ़ती हुई जटिलता में भी दिखाई देता है। इस लिए, चित्त के तमाम काम का जो भाग किसी एक व्यक्ति के हिस्से आता है, वह अपेक्षाकृत कम रह जाता है। इसी वजह से व्यक्ति को अपने अहं को सीमित रखना चाहिए, उसे भूलना चाहिए, और विज्ञान में उतना ही योगदान देना चाहिए जितना उससे अपेक्षित है। बेशक उसे कोशिश करनी चाहिए, लेकिन उससे बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं की जानी चाहिए; और बदले में उसे खुद भी अपने आप से उम्मीद एक हद तक ही रखनी चाहिए।
आर. श्रीवत्सन अन्वेषी रिसर्च सेंटर फॉर विमेन्स स्टडीज़, हैदराबाद में वरिष्ठ फेलो रह चुके हैं। वह विकास, स्वास्थ्य, धर्म और संस्कृति पर काम करते हैं। वे दार्शनिक और राजनीतिक सिद्धांतकार हैं। ईमेल: r.srivats@gmail.com ↩︎
अदिति मुखर्जी उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद में भाषाविज्ञान की प्रोफेसर रही हैं और राष्ट्रीय अनुवाद मिशन की निदेशक भी रह चुकी हैं। फिलहाल IIIT हैदराबाद में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। ईमेल: mukherjee.aditi@yahoo.com ↩︎
तादात्म्य-दर्शन = identity philosophy ↩︎
उद्धरण चिह्नों में 'सत्य-प्रत्यय' (Idea) शब्द का प्रयोग हेगेल द्वारा अपने समकालीन रोमांटिकों के उपदेशात्मक विचारों की आलोचना को दर्शाने के लिए किया गया है। यह सत्य-प्रत्यय शब्द से अलग है जिसका प्रयोग हमने हेगेल के The Idea को अनुवाद करने के लिए किया है। ↩︎
विचारात्मक = speculative. ↩︎
तर्क-वाक्य = logical proposition. ↩︎
निर्णयन = judgment as the act of logical predication (not in the sense of a logically sound decision). ↩︎
द्रव्य = substance (अरस्तू के अनुसार सब्सट्रेट के रूप में) ↩︎
आधार-कारण = ground(s) ↩︎
विसंरचना = deconstruct ↩︎
अचिंतित = The Unthought – that which remains out of thought ↩︎
रहस्यपूर्ण परमानंद = mystical ecstasy (परमानन्द, हेगेल के दृष्टिकोण से समझ (कांट के अनुसार) के परिधि के बाहर की सोच के विस्तार के बारे में गलतफहमी है।) ↩︎
हेगेल के अनुसार अवधारणा की हरकत, या विचारात्मक चिंतन, समझातीत आत्म-अतिक्रमण की एक सच्ची और युक्तिपूर्ण हरकत है; और एक छात्र यह स्पष्ट करेगा कि हेगेल ने [एन्साइक्लोपीडीया, पैराग्राफ 82, छात्रों के नोट्स में] यह सिखाया था कि जिसे सामान्यतः ‘रहस्यपूर्ण’ कहा जाता है, वह भी अपने अंतर्निहित रूप में विचारात्मक धारा के अलावा कुछ नहीं है। ↩︎